Tuesday, 27 November 2018

बानरस टाॅकिज- सत्य व्यास

बनारस टाॅकिज- सत्य व्यास
समीक्षक- बबलु जाखड़
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सत्य व्यास द्वारा लिखित  *बनारस टॉकीज़* पढ़कर कुछ अजीब सा ही लगा।
बहुचर्चित होने के बावजूद ये कहा जाए तो ठीक ही होगा कि उपन्यास सामान्य सा ही था, ना कुछ स्पेशल था, ना ज्यादा सस्पेन्स, कुलमिलाकर ऐसा कथानक जिसको पढ़ा तो जा सकता है पर तारीफ के पूल नही बांधे जा सकते, बेशर्ते की उपन्यास में केवल 179 पेज ही होते।

आखिर के 13 पेज में कहानी में कुछ ट्विस्ट बनता है पर वो बनता ही है।
एक ऐसी कहानी जिसमे कोई सस्पेंस नहीं, चुहलबाज़ी भी नहीं, ना कोई हार्ट टचिंग इवेंट, बस बकैती कुछ कुछ है,
कई जगह संवाद भी खूब लंबे व वक्त खाउ ही लगे।
फिर भी ऐसा उपन्यास जिसको पढ़ा जा सकता है, पैसा वसूल हो जाये।
पर जो लोग ऐसा उपन्यास पढ़ने के तमनाई है जो कुछ विशेष हो, कुछ हटकर हो, वो यहां चाहे अपना समय खराब ना करें।
गालियों का भरपूर प्रयोग हुआ है।
फिर भी अच्छा है।

Sunday, 18 November 2018

प्रेतों का निर्माता- वेदप्रकाश कंबोज

प्रेतों का निर्माता- वेदप्रकाश कंबोज,
समीक्षा- शिखा अग्रवाल, दिल्ली।
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         सबसे पहले तो यही कहना चाहूंगी कि मुझे समीक्षा लिखनी नहीं आती खासकर कम शब्दों में तो बिल्कुल नहीं, यही कारण है कि नावेल पढे 6 हफ्ते हो गए लेकिन अभी तक नहीं दी, अब प्रवीण आजाद जी के कहने पर निष्पक्ष समीक्षा लिखने की कोशिश की है।
         मैंने वेदप्रकाश शर्मा जी के नावेल पढकर अपने पढने की शुरुआत की थी और यही समझती थी कि विजय विकास उनके मौलिक पात्र है, ये तो यही आकर पता लगा कि विजय,अलफंसे काम्बोज जी का पात्र है
     सबसे पहले बात लेखकीय कि तो उसे पड़कर आंखे नम हो गयी, पैसे वही वसूल हो गए, उसमे सर ने ओमप्रकाश शर्मा जी, जवाहर चौधरी जी जैसी हस्तियों के बारे में अपने विचार भी बताए है, उसपे पुराना कवर पेज तो सोने पे सुहागा ही था, ये नावेल 1974 में आया था इसलिए विश्वास करना ही मुश्किल लगा कि उस समय सर मेडिकल साइंस का ऐसा विवरण कैसे कर सके, उस समय इंटरनेट जैसी चीजों का कोई वजूद भी नही था तब माइड चेंजिंग का बिल्कुल नया कांसेप्ट इस नावेल में पड़ने को मिला जो सर की अभूतपूर्व कल्पनाशीलता तो दर्शाता है, विजय, अल्फांसो,   गिल्बर्ट, चीनीचोर, तातारी, कबाड़ी, बन्दर(धनुषटन्कार)और सिंगही जैसे बहुत किरदार पढने को मिले, विजय, कबाड़ी, तातारी की झकझ भी कमाल की है जिन्हें पढकर बरबस ही हँसी आ जाती है, मेरे जैसे नए पाठक को भी जिन्होंने पहले इनका कोई भी नावेल नहीं पढा, नावेल पड़कर पात्रों को समझने में कोई परेशानी नहीं होती, निसन्देह ये नावेल अपने समय का एक मास्टरपीस रहा होगा इसमे कोई दो राय नहीं है।
       रही बात कुछ कमियों की तो मुझे नावेल का साइज कुछ बड़ा लगा, हमें नावेल एक स्टैण्डर्ड साइज में पढने की आदत हो गयी है, इसलिए ये नावेल हाथ मे लेकर कुछ अलग लगा, दूसरी और सबसे बड़ी बात प्रूफ रीडिंग बिल्कुल बेकार थी, बहुत बार ऐसा हुआ कि एक दो शब्द नहीं बल्कि पूरी की पूरी लाइन ही गायब हो गयी, लेकिन शुक्र था कि पढने पे समझ आ रहा था कि दूसरे ने क्या कहा होगा और उसका कहानी पे कोई फर्क नही पड़ रहा था।
   सर को ऐसी रचना देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया और यही उम्मीद है कि आगे भी और जल्द ही हमे ऐसी ही दुर्लभ रचनाये पढने को मिलेंगी।
भूल चूक की माफी के साथ।
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उपन्यास- प्रेतों का निर्माता ।
लेखक- वेदप्रकाश कंबोज
प्रकाशक- सूरज पॉकेट बुक्स- मुंबई
समीक्षक- शिखा अग्रवाल, शाहदरा, दिल्ली

ध्यान दें- इस उपन्यास के सूरज पॉकेट बुक्स के प्रथम संस्करण में ही शाब्दिक अशुद्धियाँ हैं‌, अन्य में नहीं ।


Friday, 9 November 2018

डार्क नाइट- संदीप नाय्यर


डार्क नाइट- संदीप नाय्यर





समीक्षक- दिलीप कुमार



डार्क नाइट- संदीप नाय्यर
समीक्षा- दिलीप कुमार
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डार्क नाईट पढ़ ली, कल देर रात पढ़ी, कबीर, काम,माया, प्रिया, नेहा और मीरा की कहानी ,सबसे पहले भाषा पर आते हैं ,लेखक ने जिस वर्ग को टारगेट करके कहानी लिखी थी उसे रोमन से कोई परहेज़ नहीं है लेकिन फिर भी यदि लेखक ने देवनागरी को चुना है तो ज़ाहिर है उन्हें अपनी मिट्टी और लोगों से लगाव होगा, तो भाषा के मोर्चे पर या तो अल्ट्रा मॉडर्न भाषा है या जयशंकर प्रसाद के जमाने की भाषा जैसे स्थूल, अमूर्त जैसे दुरूह शब्दो का बहुतायत प्रयोग,हिंदुस्तानी जुबान जो कि बहुतायत उर्दू शब्दों से भरी हो उसमें एक मुस्लिम युवक का इस भाषा मे कुछ ना बोलना काफी खटकता है। लेखक जिस भाषा में संवाद करते हैं वही लिख देते तो बेहतर होता जैसे धनिया की पत्ती सब्ज़ी में सुगंध भरती है वैसे ही भाषा की सुगंध नदारद है। शब्दों की सब्ज़ी तो बनी अच्छी मगर सुगंध नदारद।  अब मेरी समझ से ये परे है कि लंदन का बैकग्राउंड लेखक ने क्यों रखा जब कहानी से अंग्रेज़ ही गायब हैं पब, बार, तो अब हर शहर में है। अब कबीर ये नायक है वो ना तो मजबूत है ना कमजोर,उसकी पिलपिलाये व्यक्तिव का कोई जस्टिफिकेशन नहीं है कि क्या बचपन की कोई घटना, माता पिता का अलगाव या विभिन्न मजहब से होना कोई मुद्दा तो नहीं है वो वजह नदारद है ।माँ -बाप का विभिन्न मजहब का होना क्या कोई मुद्दा नहीं है और इस मजहबी जहराब जूझ रहे लंदन में हिकमा, नेहा, प्रिया, माया का किसी का कबीर का मज़हब ना पूछना हैरान करता है ,लेखक इस मुद्दे से जूझने से बचता रहा।इस मुद्दे को लंदन में भी नजरअंदाज करना नामुमकिन है। नेहा की खुदकुशी अविश्वसनीय है जिस लड़के से उसके कई बार जिस्मानी संबंध रहे हों उसका सिर्फ एक बार और जिस्मानी संबंध पर खुदकुशी क्यों, पवित्रता, कौमार्यता की दुहाई तो थी नहीं फिर कबीर का प्रेम उसके जीवन में दस्तक दे रहा था, फ़िर इतनी पढ़ी लिखी और शराब और संसर्ग प्रिय लड़की की खुदकुशी थोड़ा कचोटती है।
           कबीर की अपनी कोई बुद्धि नहीं, ईगो नहीं, स्टैंड नहीं उसके जीवन की लड़कियां फुटबॉल की तरह उससे खेलती हैं कभी वो किसी के आगोश में है तो कभी किसी के और वो वूमेनाइजर भी नही है ये बात समझ में नहीं आती।नेपथ्य में एक भारतीय मां है जो अपने लड़के का हाल खबर कभी नहीं लेती और ना कभी लड़का ही मां की सुधि लेता है ।  डार्क नाईट इस बीमारी का दुख ही नहीं मनाया लेखक ने,भारतीय साहित्य का प्राण तत्व विरह है, कैसा प्रेम जब नेहा के दुख में कबीर की आंखे नहीं रोई,उस अपराध बोध में उसने जीने की इच्छा को समाप्त नहीं किया और खुद को सजा ना दी तो कैसा इश्क़ साहेब।इश्क़ की इंतेहा तब होती जब वो नेहा के गम के सबब हर लड़की को ठुकराता मगर कबीर साहब का गम बियर के झाग जैसा निकला, दूसरी बात महबूब का जिनां करने वाले शख्स को कबीर द्वारा सजा ना देने का प्रयास और कुछ भी ना करना थोड़ा खटकता है ,पुरूषार्थ नाम की भी एक चीज होती है जो सिर्फ टेस्टोस्टेरोन तक महदूद नहीं रहती। निश्छल प्रेम नाम जैसा तो कुछ दिखा ही नहीं, पोर्न का विकल्प होता है साहित्य, प्रेम के डिटेल वर्णन में कहीं नहीं आंसू भी छलके,ना कोई जार जार रोया ना कोई मिलकर बाग बाग हो गया, पाठक दैहिक वर्णन से उत्तेजित तो हो सकता है आनंदित नहीं।
       लेखक महोदय पढ़कर आनंद के अतिरेक आंखे यदि गीली ना हो जाएं तो उस कहानी से पाठक कैसे कनेक्ट हो सकता है, मैं कबीर के अनिर्णय से खीझता हूँ, नेहा की मौत पर नहीं रोता, एक बात और विवाह से पूर्व लिव इन में रहने वाली आर्थिक रुप से आत्मनिर्भर माया और प्रिया से कबीर एक साथ क्यों नहीं निभा सकता था ,विवाह जैसी कोई बात नहीं थी कबीर कमाता भी था फिर दो गर्लफ्रैंडस क्यों नहीं रख सकता जब इतनी ओपन सोसाइटी थी।क्लाइमेक्स पर बात करते हैं मंदी इस तरह अचानक नहीं आती जितनी मेरी दुनिया भर के वित्तीय बाजारों की समझ है उसमें फाइनेंसियल मार्किट में काम करने वाले लोग पहले ही समझ जाते हैं और अपना पैसा निकाल लेते हैं ,माना प्रिया चोटिल थी मगर फ्लैट पर मोबाइल से दीन दुनिया की खबर मिलती रहती। प्रिया की फर्म डूब गई, मंदी आ गई तो भी फाइनेंस में ह्यूमन माइंड ही असेट होता है, रोजी रोटी कमायी जा सकती थी अनाथ रही थी रईसजादी नहीं कहीं भी जी खा सकती थी। मंदी में महबूब नहीं बेचे जाते लेखक साहब ।साहित्य हो,लुग्दी साहित्य हो या नई वाली हिंदी उसकी पहली शर्त पठनीयता है जो कि इस पुस्तक में आधे हिस्से के बाद आती है, समरसिद्धा जैसी कृति के लेखक की रचना पर
जारे जागे सुभाउ हमारा
अनभल देखि ना जाइ तुहारा।
संदीप नय्यर साहब को इस सर्जना हेतु बधाई और साधुवाद,,पुस्तक की सफलता हेतु शुभकामनाएं,,कहा,सुना माफ संदीप साहब,,,इति शुभम भवति.
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पुस्तक- डार्क नाइट
लेखक- संदीप नाय्यर
समीक्षक- दिलीप कुमार


Friday, 28 September 2018

न बैरी न कोई बैगाना- सुरेन्द्र मोहन पाठक

SMP साहब की आत्मकथा की समीक्षा

मैं सुरेन्द्र मोहन पाठक जी की लेखनी का कायल हूँ। एक कहानीकार के रूप में मेरे मन में उनके लिए अपार सम्मान है। जब यह पता चला कि उनकी जीवनी आ रही है तो अपने प्रिय लेखक के बारे में "और भी बहुत कुछ पढने को मिलेगा" यह संभावनाएं बलवती हो उठी।

मैं भी जानता हूँ की NBNKB की एक प्रति प्राप्त करने के लिए मुझे कितना इंतिजार करना पड़ा। बड़े मनोयोग से इस किताब को पढना आरम्भ किया। एक नहीं दो नहीं तीन बार पढा। परंतु बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि जिस उत्सुकता और जिज्ञासा के साथ इसकी प्रतीक्षा थी, इस पुस्तक ने उतना ही निराश किया।
क्षमा प्रार्थना के साथ कुछ बिंदु रख रहा हूँ।
1. लेखक ने अपनी आत्महत्या को बहुत ही दिलोदिमाग से लिखा है।
2. इस पुस्तक का नाम गलती से गलत रखा गया है।
3. सही नाम "हर कोई बैरी हर कोई बैगाना" होना चाहिए था।
4. इसे आत्मकथा कहना ही गलती है।
5. वास्तव में यह आत्मव्यथा है।
6. जिसमें आधे से भी ज्यादा दूसरों‌ के बारे लिखा गया है।
7. इस खण्ड में तो लेखक ने अपना मूल्यांकन एक चम्मचे के रूप में ही किया है।
8. जो चमचागिरी भी करता है और किसलता भी है।
9. अहसानफरामोशता अत्यधिक मात्रा में दृष्टिगोचर होती है।
10. यह पुस्तक कल्पना से बिलकुल भी नहीं लिखी गयी।
12. बल्कि कलप-कलप कर लिखी गयी है।
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प्रवीण आजाद
दिल्ली, भारत।

(फेसबुक ग्रुप से)

Wednesday, 12 September 2018

मौत की आवाज- अकरम इलाहाबादी

मौत की आवाज- अकरम इलाहाबादी
समीक्षा- आनंद सिंह
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पिछले हफ्ते इब्ने सफ़ी बी.ए. जी की कृति ‘मूंछ मूँडने वाले’ पढ़ी थी, न जाने क्यों मगर मुझे उसे पढ़ने पर वह संतुष्टि प्राप्त नहीं हुई जो सामान्यतः सफ़ी जी की किताबें पढ़ कर प्राप्त होती हैं. शायद इसीलिए इस हफ्ते मैंने किसी अन्य लेखक की रचना पढ़ने का विचार किया और अपने कलेक्शन से मशहूर लेखक अकरम इलाहाबादी द्वारा लिखित उपन्यास ‘मौत की आवाज’ जो की जासूसी मासिक ‘जासूसी पंजा’ के तीसवें अंक में प्रकाशित हुआ था ढूंढ निकाला. हालांकि मैंने अकरम जी की लेखनी के शाहकर कुछ ही उपन्यास पढे हैं, चूंकि वो उर्दू लेखक थे और अब तक उनके केवल कुछ ही उपन्यास मुझे हिन्दी में मिल पाये हैं; परंतु यह कहना उचित होगा उनकी लेखनी भी काफी संतुलित तथा रोमांचकारी थी तथा इन कुछ उपन्यासों को पढ़ कर यह समझ सका हूँ कि वह भी पाठक को अपनी कहानी से अंत तक बांधे रखने की महारत रखते थे.

                          चलिये बात करते हैं ‘जासूसी पंजा’ मासिक के तीसवें अंक की, जिसमें प्रकाशित हुई थी अकरम इलाहाबादी द्वारा लिखित उपन्यास ‘मौत की आवाज’. किताब की शुरुआत होती है अत्यंत घनघोर बारिश की रात से जब शहर अकबरपुर के एक सम्मानित व्यक्ति सर अकबर की रहस्यमय ढंग से मृत्यु हो जाती है जो कि अपने पीछे एक नौजवान पुत्र शहजाद और पुत्री गजाला को छोड़ जाते हैं, सुप्रीटेंडेंट खान तथा सार्जेंट बाले को तफतीश के दौरान यह मालूम होता है कि अकबर जी मृत्यु के 1 हफ्ते पहले से कुछ अजीब अजीब आवाजें सुन रहे थे जो उन्हे कहती थी ‘तुम मर जाओगे’ तथा उनका बर्ताव भी बड़ा अजीबोगरीब हो चला था. प्रारम्भिक खोज बीन में पुलिस को कोई संदेहास्पद संदेह तो न हुआ परंतु उन्हे पूछताछ से यह जरूर आभास हुआ कि मृत्यु के पीछे लोगों को रूहानी ताकतों, शैतानों के होने का शक है. तफतीश के दौरान ही उन्हे सर अकबर कि वसीयत तथा अपने पुत्र को संबोधित एक पत्र भी प्राप्त होता है जिसमें वह अपने पुत्र को यह बताते हैं कि उनकी एक नाजायज पत्नी तथा बेटा है तथा वह पत्र के द्वारा अपने पुत्र से यह दरख्वास्त भी करते हैं कि वह अपनी सौतेली माँ तथा भाई को खोजे तथा उन्हे अपने साथ लाये.

                      पुलिस के जाने के बाद उसी रात अकबर जी के पुत्र शहजाद को भी उसी प्रकार कि अजीब आवाज सुनाई देती है जो उसे भी कहती है कि ‘तुम मर जाओगे’, इस घटना से भयभीत शहजाद और गजाला अपनी मौसी के साथ वह हवेली छोड़ के जाने का निर्णय लेते हैं मगर तभी वहाँ दो अजनबी आते हैं जो उन्हे यह समझाते हैं कि वे उनके पिता के पीर शागिर्द थे तथा उनके होते हुए कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा.
परंतु अगले ही दिन शहजाद पर जान लेवा हमला होता है तथा वे दोनों अजनबी भी हवेली के पीछे बेहोश अवस्था में पाये जाते हैं. अत्यंत सोच विचार के बाद अन्य लोग भी सहमत होने लगते हैं कि उस हवेली में किसी शैतान का वास है जो कि सर अकबर के वंश का विनाश करके ही मानेगा.

                 क्या खान और बाले इस गुत्थी को सुलझा पाएंगे? क्या सच मुच हवेली में किसी शैतान का साया था? कौन थे वे दो अजनबी? सर अकबर के नाजायज बीवी तथा बेटे का क्या रहस्य था? इस उपन्यास में एक एक गुत्थी धीरे धीरे खुलती है जो कि हमें अंत तक इस कहानी से बांधे रहती है.

                    इस उपन्यास को पढ़ने पर हमें कई तथ्य भी प्राप्त होते हैं. जैसे कि यह आवश्यक नहीं कि कोई व्यक्ति हमें पहली नजर में जैसा प्रतीत हो, वह असलियत में वैसा ही हो. या फिर धन के लालच में एक औरत अपने पति के खिलाफ भी साजिश रच सकती है. तथा अगर हम प्रयास करें तो हर अकल्पनीय घटना के पीछे का कारण भी पता लगाया जा सकता है.

168 पेज का यह विशेषांक मुझे काफी आनंदित लगा, तथा अकरम जी का लेखन सराहनीय है.
और हाँ एक और बात, हिन्दी में पढ़ने के बावजूद भी इसमें उर्दू शब्दों का अत्यधिक प्रयोग है तथा इतने दिनों बाद पढ़ने पर मुझे गर्व हो रहा है कि मैं अभी भी काफी उर्दू शब्दों का अर्थ समझ पाता हूँ.   
             आशा करता हूँ आप में जी जिन लोगो ने इस उपन्यास का वाचन किया है वह भी अपने विचार जरूर साझा करेंगे।
-
समीक्षा- आनंद सिंह

Saturday, 25 August 2018

लखनवी जासूस- ओमप्रकाश शर्मा जनप्रिय लेखक

लखनवी जासूस- ओमप्रकाश शर्मा जनप्रिय लेखक
समीक्षा- आनंद सिंह

कल मैं अपने छोटे से नॉवेल संग्रह में पढ़ने के लिए नॉवेल खोज रहा था और तभी मुझे एक यह किताब मिली. ‘जासूस’ जो की एक मासिक पत्रिका थी उसका मार्च 1965 का अंक. यह पत्रिका सन 1948 से लाला नारायनदास गर्ग के स्वामित्व में रंगमहल प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित की जा रही थी [हालांकि इसका प्रकाशन बंद कब हुआ यह जानकारी मुझे नहीं है]. किताब के प्रथम कुछ पृष्ठों से आगे बढ़ा तो इसमें मुझे महान लेखक ‘ओम प्रकाश शर्मा’ जी द्वारा लिखित कृति ‘लखनवी जासूस’ प्राप्त हुई और मैं बैठ गया इसे पढ़ने.
कहानी को लखनऊ के नवाब नवाब वाजिद अली शाह के शासन के समय सेट किया गया है, वहाँ के एक सम्पन्न सौदागर की बेटी अपहृत कर ली जाती है परंतु विभिन्न प्रयासों के बावजूद भी पुलिस उसका पता नहीं लगा पाती है. इस पर लखनऊ के रेजीमेंट स्लीमन द्वारा चुनौती दिये जाने पर नवाब उससे शर्त लगाते हैं कि 1 महीने के अंदर- अंदर वो सौदागर कि बेटी को खोज निकालेंगे और फिर अपने सबसे प्रतिष्ठित जासूस चतुरी पांडे को यह ज़िम्मेदारी सौंपते हैं. चतुरी यह कार्य अपने शिष्य नज़ीर के सहयोग से करने का फैसला करते हैं और इसके साथ ही शुरू होती है एक कहानी जिसमें उनका पाला कई लोगों से होता है जैसे एक झूठा मक्कार फकीर जिसका धर्म लोगो की सेवा करना नहीं परंतु धन कमाना, एक सौदागर जो कि अपने फायदे के लिए देश को भी बेचने पे तुला है, एक पागल औरत जो कि एक सम्पन्न परिवार की होते हुए भी दर दर भटक रही है. इसी कहानी में चतुरी जी अपने पुराने मित्र के पुत्र से भी मिलते हैं जो कि अंग्रेजों से प्रताड़ित किया हुआ है और अब उनके विरोध के लिए एक छोटी सेना का प्रतिनिधित्व कर रहा है.
हालांकि पत्रिका का नाम ‘जासूस’ होने से इस नॉवेल को जासूसी श्रेणी में प्रकाशित किया गया है परंतु मेरी नज़र में यह एक साहसिक घटनाओं वाली नॉवेल की श्रेणी में जादा फिट बैठती है. लेखक ओम प्रकाश शर्मा जी ने नवाब वाजिद के समय की सामाजिक स्थिति का भी चित्रण करने का प्रयास किया है तथा कहानी के माध्यम से यह भी दिखाने का प्रयास किया है कि किस प्रकार अंग्रेज़ धीरे धीरे करके भारत वर्ष के विभिन्न संप्रान्तों पर अपना कब्जा जमा रहे थे. नॉवेल के अंत तक लेखक ने यह भी चित्रण का प्रयास किया है कि जहां एक तरफ अंग्रेज़ भारत में अपने पैर जामा चुके थे वहीं दूसरी ओर उनके खिलाफ विद्रोह के भी बीज पड़ चुके थे जिसमें भाग लेने के लिए हर प्रकार तथा वर्ग के स्त्री – पुरुष जुडने लगे थे फिर चाहे वो कोई बुजुर्ग जासूस हो, नौजवान युवा हो, नया शादीशुदा जोड़ा हो या फिर कोई विधवा महिला.
भले ही कहानी में कमियाँ हैं परंतु मैं ओम प्रकाश शर्मा जी की इस कृति के लिए सराहना जरूर करूंगा..

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समीक्षा- आनंद सिंह
फेसबुक से

Thursday, 26 July 2018

कमीना- शुभानंद

पुस्तक समीक्षा : कमीना
समीक्षक- देवेन पाण्डेय

लेखक : शुभानन्द
प्रकाशक : सूरज पॉकेट बुक्स l
अस्सी और नब्बे के दशक में पल्प फिक्शन का काफी बोलबाला हुवा करता था ,
तब मनोरंजन के साधन कमतर होने कारण पल्प फिक्शन का बाजार ख़ासा मुनाफे का था l
हर बार नए नए लेखक उभरते ,नए नए पात्र बनते, कुछ पात्र अच्छे होते ,
कुछ बुरे तो कुछ ग्रे शेड लिए हुए l
इन्हें पल्प फिक्शन कहकर हमेशा से साहित्य की मुख्यधारा से अलग रखा गया ,
वजह थी इनकी कैची लैंग्वेज ,भाषा ,कहानी कहने का तरीका ,
और छपाई की क्वालिटी l
किन्तु साहित्य की दुनिया में अछूत मानी जानेवाली यही पल्प फिक्शन बिक्री
में सबसे आगे रहती थी l
उस समय पल्प फिक्शन यानी लुगदी साहित्य बड़े ही निम्नस्तर
के पेजेस पर छपा करता था ,जो लुगदी से बना होता था ,
जिस कारण उपन्यास की मोटाई भी काफी दिखती l
लेकिन बदलते समय के साथ ही साथ लुगदी साहित्य भी कही पीछे छूट गए ,
रह गए तो केवल कुछ धुरंधर लेखक जो अभी भी इस विधा को आगे बढ़ा रहे है
किन्तु बदले हुए स्वरूप में l
जिनमे से वेद प्रकाश शर्मा एवं सुरेन्द्र मोहन पाठक जी का नाम प्रमुखतया है l
अब लुगदी साहित्य लुगदी नहीं रहा ,
उसका स्वरूप अब चमकदार व्हाईट पेपर और ग्लोसी कवर ने ले ली ,
अब लुगदी साहित्य हार्पर कॉलिन्स जैसे प्रकाशनों से भी छपने लगी थी l
यदि इन गिनती के लेखको के नाम छोड़ दिये जाए तो बमुशिकल ही कोई
और मिलेगा जो इस साहित्य को आगे बढ़ाने को तत्पर होगा l
अस्सी और नब्बे के इसी जूनून को अपने में समेटे कुछ लोग आज भी इस विधा
को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे है जो वाकई सराहनीय है l
मेरी ही जानकारी में कुछ मित्र है जो इस जूनून से ग्रस्त है ,
इनमे से एक है ‘’कंवल शर्मा ‘’ जी एवं ‘’शुभानन्द जी ‘’l
शुभानन्द जी बाल पॉकेट बुक्स के बेताज बादशाह कहे जाने वाले
‘’एस सी बेदी ‘’ के बड़े फैन है ,उनकी बाल पॉकेट बुक्स एवं उनके
लिखे चरित्रों ‘’राजन-इकबाल ‘’ की दीवानगी में उन्होंने राजन-इकबाल को
आधार बना कर कई उपन्यास लिख डाले l
और अपने इसी जूनून में वे एक कदम आगे की ओर बढ़ कर प्रकाशन
क्षेत्र में भी उतर चुके है , वे जिनके दीवाने थे वे ‘’एस सी बेदी ‘’ भी
अब इनके प्रकाशन ‘’सूरज पॉकेट बुक्स ‘’ में राजन इकबाल सीरिज का एक
नया उपन्यास लिख रहे है ,वो भी काफी अंतराल के बाद l
पल्प फिक्शन की इसी कड़ी में बात करूँगा शुभानन्द जी द्वारा लिखित ‘’कमीना ‘’
के बारे में ,जो उनके द्वारा रचित पात्र ‘’जावेद-अमर-जॉन ‘’
सीरिज का तीसरा उपन्यास है l
इसकी कहानी है अभिषेक मिश्रा की , वो कहानी का सूत्रधार भी है l
अभिषेक छोटे शहर का एक अति महत्वकांक्षी युवक है ,
वो जीवन में आगे बढ़ने के लिए कुछ भी कर सकता है l
लेकिन वह जानता है के उसकी यह लालसा छोटे शहर में पूरी होने से रही ,
इसलिए वह राह पकड़ता है मुंबई की l
अभिषेक केवल नौवी तक पढ़ा बंदा है ,लेकिन दिमाग लोमड़ी की तरह शातिर है l
कुछ छोटे मोटे काम करने के बाद उसने हाथ थामा दिलावर का ,जो ड्रग माफिया था ,
और उसका ड्रग नेटवर्क गोवा तक फैला हुवा था l
दिलावर जो अनुभवी ड्रग डीलर था ,किन्तु इसके बावजूद उसके काम में जोखिम अधिक था ,
ड्रग डील में हुयी पुलिस की झड़पो से कई बार उसका नुकसान भी हुवा था l
अभिषेक ने दिलावर के गैंग में कदम रखते ही अपनी दूरदर्शिता एवं लोमड़ी सी बुद्धि
का प्रयोग करना शुरू कर दिया, अभिषेक ने अपने तरीके से काम को सम्भाला ,
दिलावर अभिषेक से प्रभावित हो गया था वह उसकी क्षमता को आँक चूका था ,
जहा दिलावर का दिमाग खत्म होता था वहा से अभिषेक का शुरू होता था l
इस बात का अहसास दिलावर को जब हुवा तब तक बहुत देर हो चुकी थी l
अभिषेक किसी के रोके न रुकने वाला था l
किन्तु फिर इसका रास्ता काटा ‘’जावेद-अमर-जॉन ‘’ रूपी बिल्लियों ने ,
लेकिन अभिषेक भी कोई चूहा न था जिसे बिल्ली हजम कर जाये वह ऐसा
छछुन्दर था जिसे सांप भी न निगल पाए न उगल पाए l
फिर शुरू हुवा ‘’तू डाल डाल मै पात पात ‘’ का खेल जिसमे जीत किसकी होनी है
यह उपन्यास के अंतिम पृष्ठ ही बताएँगे l
लेखन शैली की बात करे तो कमीना पढ़ते समय आपको लगता है के आप वाकी पल्प
फिक्शन पढ़ रहे है न की पल्प के नाम पर काले पन्ने l
कहानी शुरू से अंत तक कसावट लिए हुए है , कही भी ऐसा न लगा के कहानी
अपनी पकड खो रही है l 164 पृष्ठों की इस कहानी में नकारात्क किरदार अभिषेक
ही हर जगह छाया रहा है l इसकी प्रेजेंस इतनी पावरफुल है के उसके सामने
जावेद-अमर-जॉन मेहमान कलाकार मात्र रह गए l
कैरेक्टर डिजायनिंग बढ़िया है ,चाहे अभिषेक हो या भदेस ‘’दिलावर ‘’ ,
सबकी रूपरेखा इस तरह रखी गयी है के पढ़ते समय इनका एक अक्स
दिमाग में उभर आता है l
नैरेशन भी समां बाँधने में कामयाब है ,अभिषेक खुद अपनी कहानी का सूत्रधार है ,
अपने लिए गए एक-एक कदम का उसे संज्ञान है किन्तु फिर भी उसे किसी चीज की
ग्लानी नहीं है ,न कोई रंज है l
इसके चरित्र पर शीर्षक एकदम उपयुक्त और सटीक है l
सारी बातो का सार यह के थ्रिलर ,सस्पेंस एवं रोमांच पसंद पाठको को यह उपन्यास
अवश्य पसंद आएगा यदि कही और तुलना न की जाए तो l
यदि हम नए नवेले उपन्यासकारो की तुलना ‘’वेद प्रकाश ‘’ एवं ‘पाठक ‘’
जी से करने लग जाए और उसी चश्मे से पढना शुरू करे तो यकीन मानिए यदि
लेखक ने बेहतर भी लिखा हो तो भी आप उसे कमतर ही समझेंगे l 
इसलिए इसे पढना हो तो पहले से बनाए दायरों से थोडा निकल कर पढ़े तब
ज्यादा मजा आयेगा और पसंद भी आयेगी l

देवेन पाण्डेय
http://deven-d.blogspot.in/2016/07/blog-post_26.html
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