Saturday, 25 August 2018

लखनवी जासूस- ओमप्रकाश शर्मा जनप्रिय लेखक

लखनवी जासूस- ओमप्रकाश शर्मा जनप्रिय लेखक
समीक्षा- आनंद सिंह

कल मैं अपने छोटे से नॉवेल संग्रह में पढ़ने के लिए नॉवेल खोज रहा था और तभी मुझे एक यह किताब मिली. ‘जासूस’ जो की एक मासिक पत्रिका थी उसका मार्च 1965 का अंक. यह पत्रिका सन 1948 से लाला नारायनदास गर्ग के स्वामित्व में रंगमहल प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित की जा रही थी [हालांकि इसका प्रकाशन बंद कब हुआ यह जानकारी मुझे नहीं है]. किताब के प्रथम कुछ पृष्ठों से आगे बढ़ा तो इसमें मुझे महान लेखक ‘ओम प्रकाश शर्मा’ जी द्वारा लिखित कृति ‘लखनवी जासूस’ प्राप्त हुई और मैं बैठ गया इसे पढ़ने.
कहानी को लखनऊ के नवाब नवाब वाजिद अली शाह के शासन के समय सेट किया गया है, वहाँ के एक सम्पन्न सौदागर की बेटी अपहृत कर ली जाती है परंतु विभिन्न प्रयासों के बावजूद भी पुलिस उसका पता नहीं लगा पाती है. इस पर लखनऊ के रेजीमेंट स्लीमन द्वारा चुनौती दिये जाने पर नवाब उससे शर्त लगाते हैं कि 1 महीने के अंदर- अंदर वो सौदागर कि बेटी को खोज निकालेंगे और फिर अपने सबसे प्रतिष्ठित जासूस चतुरी पांडे को यह ज़िम्मेदारी सौंपते हैं. चतुरी यह कार्य अपने शिष्य नज़ीर के सहयोग से करने का फैसला करते हैं और इसके साथ ही शुरू होती है एक कहानी जिसमें उनका पाला कई लोगों से होता है जैसे एक झूठा मक्कार फकीर जिसका धर्म लोगो की सेवा करना नहीं परंतु धन कमाना, एक सौदागर जो कि अपने फायदे के लिए देश को भी बेचने पे तुला है, एक पागल औरत जो कि एक सम्पन्न परिवार की होते हुए भी दर दर भटक रही है. इसी कहानी में चतुरी जी अपने पुराने मित्र के पुत्र से भी मिलते हैं जो कि अंग्रेजों से प्रताड़ित किया हुआ है और अब उनके विरोध के लिए एक छोटी सेना का प्रतिनिधित्व कर रहा है.
हालांकि पत्रिका का नाम ‘जासूस’ होने से इस नॉवेल को जासूसी श्रेणी में प्रकाशित किया गया है परंतु मेरी नज़र में यह एक साहसिक घटनाओं वाली नॉवेल की श्रेणी में जादा फिट बैठती है. लेखक ओम प्रकाश शर्मा जी ने नवाब वाजिद के समय की सामाजिक स्थिति का भी चित्रण करने का प्रयास किया है तथा कहानी के माध्यम से यह भी दिखाने का प्रयास किया है कि किस प्रकार अंग्रेज़ धीरे धीरे करके भारत वर्ष के विभिन्न संप्रान्तों पर अपना कब्जा जमा रहे थे. नॉवेल के अंत तक लेखक ने यह भी चित्रण का प्रयास किया है कि जहां एक तरफ अंग्रेज़ भारत में अपने पैर जामा चुके थे वहीं दूसरी ओर उनके खिलाफ विद्रोह के भी बीज पड़ चुके थे जिसमें भाग लेने के लिए हर प्रकार तथा वर्ग के स्त्री – पुरुष जुडने लगे थे फिर चाहे वो कोई बुजुर्ग जासूस हो, नौजवान युवा हो, नया शादीशुदा जोड़ा हो या फिर कोई विधवा महिला.
भले ही कहानी में कमियाँ हैं परंतु मैं ओम प्रकाश शर्मा जी की इस कृति के लिए सराहना जरूर करूंगा..

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समीक्षा- आनंद सिंह
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Thursday, 26 July 2018

कमीना- शुभानंद

पुस्तक समीक्षा : कमीना
समीक्षक- देवेन पाण्डेय

लेखक : शुभानन्द
प्रकाशक : सूरज पॉकेट बुक्स l
अस्सी और नब्बे के दशक में पल्प फिक्शन का काफी बोलबाला हुवा करता था ,
तब मनोरंजन के साधन कमतर होने कारण पल्प फिक्शन का बाजार ख़ासा मुनाफे का था l
हर बार नए नए लेखक उभरते ,नए नए पात्र बनते, कुछ पात्र अच्छे होते ,
कुछ बुरे तो कुछ ग्रे शेड लिए हुए l
इन्हें पल्प फिक्शन कहकर हमेशा से साहित्य की मुख्यधारा से अलग रखा गया ,
वजह थी इनकी कैची लैंग्वेज ,भाषा ,कहानी कहने का तरीका ,
और छपाई की क्वालिटी l
किन्तु साहित्य की दुनिया में अछूत मानी जानेवाली यही पल्प फिक्शन बिक्री
में सबसे आगे रहती थी l
उस समय पल्प फिक्शन यानी लुगदी साहित्य बड़े ही निम्नस्तर
के पेजेस पर छपा करता था ,जो लुगदी से बना होता था ,
जिस कारण उपन्यास की मोटाई भी काफी दिखती l
लेकिन बदलते समय के साथ ही साथ लुगदी साहित्य भी कही पीछे छूट गए ,
रह गए तो केवल कुछ धुरंधर लेखक जो अभी भी इस विधा को आगे बढ़ा रहे है
किन्तु बदले हुए स्वरूप में l
जिनमे से वेद प्रकाश शर्मा एवं सुरेन्द्र मोहन पाठक जी का नाम प्रमुखतया है l
अब लुगदी साहित्य लुगदी नहीं रहा ,
उसका स्वरूप अब चमकदार व्हाईट पेपर और ग्लोसी कवर ने ले ली ,
अब लुगदी साहित्य हार्पर कॉलिन्स जैसे प्रकाशनों से भी छपने लगी थी l
यदि इन गिनती के लेखको के नाम छोड़ दिये जाए तो बमुशिकल ही कोई
और मिलेगा जो इस साहित्य को आगे बढ़ाने को तत्पर होगा l
अस्सी और नब्बे के इसी जूनून को अपने में समेटे कुछ लोग आज भी इस विधा
को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे है जो वाकई सराहनीय है l
मेरी ही जानकारी में कुछ मित्र है जो इस जूनून से ग्रस्त है ,
इनमे से एक है ‘’कंवल शर्मा ‘’ जी एवं ‘’शुभानन्द जी ‘’l
शुभानन्द जी बाल पॉकेट बुक्स के बेताज बादशाह कहे जाने वाले
‘’एस सी बेदी ‘’ के बड़े फैन है ,उनकी बाल पॉकेट बुक्स एवं उनके
लिखे चरित्रों ‘’राजन-इकबाल ‘’ की दीवानगी में उन्होंने राजन-इकबाल को
आधार बना कर कई उपन्यास लिख डाले l
और अपने इसी जूनून में वे एक कदम आगे की ओर बढ़ कर प्रकाशन
क्षेत्र में भी उतर चुके है , वे जिनके दीवाने थे वे ‘’एस सी बेदी ‘’ भी
अब इनके प्रकाशन ‘’सूरज पॉकेट बुक्स ‘’ में राजन इकबाल सीरिज का एक
नया उपन्यास लिख रहे है ,वो भी काफी अंतराल के बाद l
पल्प फिक्शन की इसी कड़ी में बात करूँगा शुभानन्द जी द्वारा लिखित ‘’कमीना ‘’
के बारे में ,जो उनके द्वारा रचित पात्र ‘’जावेद-अमर-जॉन ‘’
सीरिज का तीसरा उपन्यास है l
इसकी कहानी है अभिषेक मिश्रा की , वो कहानी का सूत्रधार भी है l
अभिषेक छोटे शहर का एक अति महत्वकांक्षी युवक है ,
वो जीवन में आगे बढ़ने के लिए कुछ भी कर सकता है l
लेकिन वह जानता है के उसकी यह लालसा छोटे शहर में पूरी होने से रही ,
इसलिए वह राह पकड़ता है मुंबई की l
अभिषेक केवल नौवी तक पढ़ा बंदा है ,लेकिन दिमाग लोमड़ी की तरह शातिर है l
कुछ छोटे मोटे काम करने के बाद उसने हाथ थामा दिलावर का ,जो ड्रग माफिया था ,
और उसका ड्रग नेटवर्क गोवा तक फैला हुवा था l
दिलावर जो अनुभवी ड्रग डीलर था ,किन्तु इसके बावजूद उसके काम में जोखिम अधिक था ,
ड्रग डील में हुयी पुलिस की झड़पो से कई बार उसका नुकसान भी हुवा था l
अभिषेक ने दिलावर के गैंग में कदम रखते ही अपनी दूरदर्शिता एवं लोमड़ी सी बुद्धि
का प्रयोग करना शुरू कर दिया, अभिषेक ने अपने तरीके से काम को सम्भाला ,
दिलावर अभिषेक से प्रभावित हो गया था वह उसकी क्षमता को आँक चूका था ,
जहा दिलावर का दिमाग खत्म होता था वहा से अभिषेक का शुरू होता था l
इस बात का अहसास दिलावर को जब हुवा तब तक बहुत देर हो चुकी थी l
अभिषेक किसी के रोके न रुकने वाला था l
किन्तु फिर इसका रास्ता काटा ‘’जावेद-अमर-जॉन ‘’ रूपी बिल्लियों ने ,
लेकिन अभिषेक भी कोई चूहा न था जिसे बिल्ली हजम कर जाये वह ऐसा
छछुन्दर था जिसे सांप भी न निगल पाए न उगल पाए l
फिर शुरू हुवा ‘’तू डाल डाल मै पात पात ‘’ का खेल जिसमे जीत किसकी होनी है
यह उपन्यास के अंतिम पृष्ठ ही बताएँगे l
लेखन शैली की बात करे तो कमीना पढ़ते समय आपको लगता है के आप वाकी पल्प
फिक्शन पढ़ रहे है न की पल्प के नाम पर काले पन्ने l
कहानी शुरू से अंत तक कसावट लिए हुए है , कही भी ऐसा न लगा के कहानी
अपनी पकड खो रही है l 164 पृष्ठों की इस कहानी में नकारात्क किरदार अभिषेक
ही हर जगह छाया रहा है l इसकी प्रेजेंस इतनी पावरफुल है के उसके सामने
जावेद-अमर-जॉन मेहमान कलाकार मात्र रह गए l
कैरेक्टर डिजायनिंग बढ़िया है ,चाहे अभिषेक हो या भदेस ‘’दिलावर ‘’ ,
सबकी रूपरेखा इस तरह रखी गयी है के पढ़ते समय इनका एक अक्स
दिमाग में उभर आता है l
नैरेशन भी समां बाँधने में कामयाब है ,अभिषेक खुद अपनी कहानी का सूत्रधार है ,
अपने लिए गए एक-एक कदम का उसे संज्ञान है किन्तु फिर भी उसे किसी चीज की
ग्लानी नहीं है ,न कोई रंज है l
इसके चरित्र पर शीर्षक एकदम उपयुक्त और सटीक है l
सारी बातो का सार यह के थ्रिलर ,सस्पेंस एवं रोमांच पसंद पाठको को यह उपन्यास
अवश्य पसंद आएगा यदि कही और तुलना न की जाए तो l
यदि हम नए नवेले उपन्यासकारो की तुलना ‘’वेद प्रकाश ‘’ एवं ‘पाठक ‘’
जी से करने लग जाए और उसी चश्मे से पढना शुरू करे तो यकीन मानिए यदि
लेखक ने बेहतर भी लिखा हो तो भी आप उसे कमतर ही समझेंगे l 
इसलिए इसे पढना हो तो पहले से बनाए दायरों से थोडा निकल कर पढ़े तब
ज्यादा मजा आयेगा और पसंद भी आयेगी l

देवेन पाण्डेय
http://deven-d.blogspot.in/2016/07/blog-post_26.html
#सूरज_पॉकेट_बुक्स #कमीना #शुभानन्द #Javed_Amar_John #Sooraj_Pocket_Books

Tuesday, 17 July 2018

काॅनमैन - सुरेन्द्र मोहन पाठक

काॅनमैन- सुरेन्द्र मोहन पाठक
समीक्षक- राममेहर सिंह, जींद, हरियाणा।

आज ही कॉनमैन पढ़ा तो समीक्षा लिखने की इच्छा हुई । 
कॉनमैन मुझे बेहद पसंद आया । लम्बे समय बाद  सुनील अपने पूरे रंग में था  । ओर अपने बड़े भाप्पा जी का तो कहना ही क्या वही स्मार्ट टाक फिर से पढकर बहुत अच्छा लगा । कहानी बहुत ही अच्छी  व कसी हुई लगी । कातिल का एहसास तो आधे नॉवल में हो गया था लेकिन ये पढ़ना वाकई दिलचस्प लगा कि अपना सुनील भाई  मुल्तानी कैसे उसे लपेटे में लेता है ओवरआल नॉवल पढ़ कर मायूसी नही हुई पूरे पैसे वसूल हो गए ।

अब बात खामियों की । 
मेरी नजर में सम्पूर्ण नॉवल चाहे वे एसएमपी सर के हों या आज के समय के किसी अन्य लेखक के कम ही हैं क्योंकि आज के जमाने मैं  हम हर तरह की बुक्स मूवीज वगैरह बहुत पढ़ते व देखतें हैं  ओर जो चीज मुझे हमारे ( खासकर भारतीय ) लेखकों की कहानी में  बहुत खलती है वो है आज के जमाने की टेक्नॉलजी के साथ सही तरीके से न्याय नही कर पाना । लेकिन मुझे आशा थी कि एसएमपी सर  इसका बाखूबी  इस्तेमाल करेंगें । क्योंकि मेरी नजर में सर की सबसे  बड़ी खासियत यही है  कि आप  किसी भी विषय चाहे वो पोस्टमार्टम हो या कोई जहर या कोई आला ए कत्ल उस पर बहुत मेहनत करतें आयें है और उसे  बहुत ही बेहतरीन तरीके से पेश करते आएं है । लेकिन बड़े खेद के साथ लिखना पड रहा है कि आप भी आज के जमाने की टेक्नोलॉजी के साथ समन्वय नही बैठा पा रहें है । यही कमी इस नॉवल में भी मुझे अखरती रही ।

जैसे की
1  आपने दिखाया है की कातिल  लॉबी के सीसीटीव में जाते समय तो  केप्चर  होता है तो आते समय क्यों नही । यही बात अन्य सस्पेक्ट पर लागू होती है । क्योंकि आज हर बढ़िया होटल में सीसीटीव सिक्योरटी के लिहाज  से जरूरी हैं  । आज अगर ऐसी कोई वारदात होती है तो पुलिस सबसे पहले सीसीटीव ही खंगालती है चाहे वो कितने भी दिन पुरानी क्यों न हो और इस कहानी में तो वो एक मुख्तसर समय की ही खंगालनी थी ।

2 मोबाइल लोक्शन ट्रैकिंग
ऐसी किसी भी वारदात में पुलिस सबसे पहले मकतूल के नजदीकी व पिछले कुछ समय तक टच में रहे सभी कैंडिडेट की डिटेल , लोक्शन  वगैरह पर सबसे पहले ध्यान देती है जिससे उसका काम बहुत ही आसान हो जाता है और कातिल कुछ समय के बाद ही हिरासत में होता है । आज के समय में 90 परसेंट केस ऐसे ही हल होते हैं ।

अब बात आती है इस तरह से तो कहानी ही नही बनेगी ।  सर यँहा  पर  मैं एक ही बात कहूँगा की सर जो कर गुजरें वो कम है । खासकर सर से  तो मुझे यही उमीद थी लेकिन मुझे निराशा ही हाथ लगी । आशा है सुनील, सुधीर या मुकेश माथुर सीरीज का अगला जो भी नॉवल होगा उसमे आप टेक्नोलॉजी का भरपूर इस्तेमाल मिलेगा।
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Monday, 28 May 2018

कौवों‌ का हमला- अजय सिंह

कौवों का हमला- अजय सिंह
समीक्षक- संदीप नाइक

                   कौव्वों का हमला  एक बाल उपन्यास है, जिसे श्री अजय कुमार जी ने लिखा है। श्री अजय कुमार जी ने इसे स्वयं ही प्रकाशित करने का फैसला लिया, और इसके लिए उन्होंने अमेज़न किंडल को चुना। किंडल पर उपन्यास का वर्तमान मूल्य ₹99/- है। शीघ्र ही श्री अजय कुमार जी इस उपन्यास को हार्ड कॉपी में भी स्वयं ही प्रकाशित कर नन्हे पाठकों के बीच ला रहे हैं।

उपन्यास के मुखपृष्ठ पर क्लोज़अप में नीले प्रकाश में एक कौव्वे का चित्र है जिसके पीछे बहुत सारे कौव्वे उड़ते हुए दिख रहे हैं। नीले-काले रंग में ऐसा चित्र भय का वातावरण दर्शाता है। मुझे मुखपृष्ठ किसी एक्शन फिल्म के पोस्टर जैसा लगा। कहने का तात्पर्य ये कि मुखपृष्ठ कलात्मक एवं आकर्षक है।

एक लंबे अरसे के बाद मैंने कोई बाल उपन्यास पढ़ा है। उपन्यास पढ़ कर बचपन याद आ गया।

कथाकथन शैली उत्तम है। एक भी ऐसा दृश्य नहीं है जहां बच्चे बोर हो जाएं। श्री अजय कुमार जी को बच्चों की पसंद का पूरा ज्ञान है, वे अच्छी तरह जानते हैं कि कहानी कैसी लिखने से बच्चे उसे मुग्ध होकर पढ़ते जाएंगे। सबसे अच्छी बात यह है कि लेखक ने ऐसी किसी शब्दावली का प्रयोग नहीं किया है जिसका अर्थ समझने में बच्चों को कठिनाई हो। उपन्यास उद्देशित पाठक वर्ग की पसंद व समझ के अनुरूप है।

उपन्यास की एक विशेषता यह भी है कि इसमें दृश्य वर्णन और संवादों का संतुलन बहुत अच्छा है। किसी भी पृष्ठ पर न तो लंबे संवाद हैं और न ही लंबे दृश्य वर्णन। हर पृष्ठ पर संवाद भी हैं और दृश्य वर्णन भी, जिससे न तो दृश्यों का वर्णन कहीं ज्यादा लंबा हुआ है और न ही संवाद। उपन्यास मुझे किसी फिल्म की स्क्रिप्ट की तरह लगा। और लगे भी क्यों न, श्री अजय कुमार जी स्क्रिप्ट लेखन का कार्य भी करते हैं। उनके स्क्रिप्ट लेखन का अनुभव इसमें साफ झलकता है।

तो कहानी ऐसी है कि, उन्नत और आशी अपने मां-बाप के साथ एक सोसाइटी बिल्डिंग के अपार्टमेंट में रहते हैं। उन्नत 7 साल का है और उसकी छोटी बहन आशी 4 साल की है। उन्नत और आशी अपने दोस्त मूलचंद से बहुत प्यार करते हैं, मूलचंद के साथ खेलने का कोई मौका वो नहीं छोड़ते हैं।

उन्नत को जासूसी का शौक है। उन्नत ने आसपास घट रही घटनाओं का विश्लेषण कर उनका सही अर्थ निकालने का गुण भी विकसित कर लिया है। उन्नत के पास एक डायरी है जिसमें वह उसके द्वारा सीखी गईं विभिन्न बातें, जो उसकी तर्कशक्ति बढ़ा कर जासूसी के काम आ सकती हैं, को क्रमांकवार दर्ज करता है और जरूरत पड़ने पर किसी वर्तमान समस्या का हल उन नियमों में ढूंढने का प्रयास करता है। उन्नत अपने पास एक किट भी रखता है, इस किट में उन्नत ने वो सामान शामिल किया है जो उसके अनुसार जासूसी के काम आ सकता है।

एक दिन उन्नत और आशी मूलचंद से बतिया रहे होते हैं। उन्नत देखता है कि पास ही के पेड़ पर लगभग 50 कौव्वे बैठे हुए हैं, पर वे सभी शांत हैं। उन्नत को ये अजीब लगता है। तभी उन्नत देखता है कि कौव्वे एक डाल पर से दूसरी डाल पर उछल-उछल कर नीचे की तरफ आ रहे हैं। उसे दिखता है कि रास्ते के एक ओर से मछली बेचने वाली आंटी सिर पर मछलियों का टोकरा रख कर आ रही है, तो उन्नत सारा मामला समझ जाता है। वह आशी को बताता है कि कौव्वे उन मछलियों पर हमला करने वाले हैं।

उन्नत और आशी चिल्ला चिल्लाकर मछली वाली आंटी को सावधान करने की कोशिश करते हैं। पर मछली वाली आंटी दूर होने के कारण सुन नहीं पाती। और कौव्वे मछलियों पर झपटते हैं।

पर उन्नत और आशी मूलचंद की मदद से कौव्वों को भगा कर मछली वाली आंटी की मछलियां बचाने में कामयाब हो जाते हैं, इसमें उनकी सोसायटी की बिल्डिंग के गार्ड अंकल भी मदद करते हैं। बस मूलचंद कौव्वों के द्वारा चोंच मारे जाने के कारण थोड़ा घायल हो जाता है और कुछ कौव्वे भी घायल हो जाते हैं।

कौव्वे वापस जा कर अपने पेड़ पर बैठ कर अपने सरदार की मौजूदगी में एक मीटिंग करते हैं और तय करते हैं कि हमें बदला लेना है। कौव्वे निश्चय करते हैं कि हमला ऐसा अचानक करेंगे कि दुश्मन संभल ही न पाए।

अब उन्नत, आशी, मूलचंद और इनकी मदद करने वाले गार्ड अंकल पर कौव्वों के हमले का खतरा मंडराने लगता है। वो अनजान होते हैं कि कौव्वों का हमला कब, कैसे और कहां होगा।

हमला करने की कौव्वे क्या योजना बनाते हैं और कैसे उन्नत, आशी और मूलचंद कौव्वों के हमले से निपटते हैं, ये सब बहुत रोमांचित करता है। उपन्यास के एक्शन सीन एक अलग ही थ्रिल पैदा करते हैं।

(उन्नत और आशी को पसंद नहीं की कोई उनके प्यारे दोस्त मूलचंद को ‘बदतमीजी से’ संबोधित करे। इसलिए उन्नत और आशी की भावनाओं को पूरा सम्मान देते हुए, मूलचंद कौन है इसके बारे में मैं सिर्फ इतना ही बताना चाहूंगा कि मूलचंद श्वान जाति का जीव है। उन्नत और आशी के मूलचंद के लिए प्यार का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि उन्होंने मूलचंद नाम भी इंसानों की तरह रखा हुआ है।)

चूंकि ये उपन्यास बच्चों के लिए लिखा गया है तो मैंने इसे पढ़ा भी बच्चा बन कर, और इसीलिए मैं इस उपन्यास का पूरा आनंद ले पाया। कहानी शुरू से अंत तक बांधे रखती है।

संवाद छोटे, सरल, सहज एवं मनोरंजक हैं। कोई संवाद भ्रम की स्थिति पैदा नहीं करता। इससे पूरी कहानी ही बोधगम्य हो जाती है। कहानी की गति मध्यम है, और संवाद भी गति के अनुरूप ही हैं। कहानी की गति बाल उपन्यास होने की दृष्टि से आदर्श है।

मेरी राय में बच्चों के लिए उपन्यास पठनीय है, हार्ड कॉपी में छपने के बाद इस उपन्यास को और अच्छा प्रतिसाद मिलेगा। ‘बाल उपन्यास’ श्रेणी के इस उपन्यास को मैं 7.5/10 अंक देता हूँ।

Monday, 23 April 2018

रिवेंज- एम.इकराम फरीदी

रिवेंज- एम.इकराम फरीदी, समीक्षक- अमित वधवानी

रिवेंज रवि पॉकेट बुक्स से प्रकाशित लेखक MD Md Ikram Faridi जी की कालक्रमानुसार गल्प साहित्य में पाँचवी रचना है। कवर सुंदर बन पड़ा है लुगदी उपन्यास होने के बावजूद  पेपर क्वालिटी बेहतरीन तथा प्रिंटिंग उत्कृष्ट है रिवेंज हर मुक़ाबले में MD Ikram Md Ikram Faridi जी की अब तक प्रकाशित रचनाओं से बेहतर बन पड़ी है।

               कहानी का कसाव, रहस्य, संवाद और मुख्य किरदारों खासकर उग्रसेन तथा मैना का चरित्र चित्रण तथा उनके बीच पनपता रोमांस उसपे उग्रसेन का शायराना अंदाज़ और मैना की ख़ूबसूरती का इतना सजीव और सुंदर वर्णन और इसके अलावा सोने पे सुहागा कहानी इतनी चुस्त और रेज़रफ्तार बन पड़ी है की पाठक इसे एक ही बैठक में पढ़े बिना रुक नहीं पायेंगे।

             रिवेंज को फरीदी साहब का अब तक का श्रेष्ठ लेखन कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होंगी, इस बात से मैं सहमत हूँ की क़ातिल को आसानी से पहचाना जा सकता है, इस नावेल के अंत पे अगर फरीदी साहब और थोड़ी मेहनत करते तो यह 5स्टार रेटिंग वाली मिस्ट्री बन सकती थी।

            उग्रसेन का किरदार मंत्रमुग्ध करता और जासूस कौशिक को भी पराभूत कर देने वाला बन पड़ा है उम्मीद है लेखक महोदय इसे आगे भी रिपीट करेंगे, सिर्फ कमजोर अंत की वजह से मेरी तरफ से इस(5स्टार रैंकिंग) मिस्ट्री को 4.5/5 स्टार्स।
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समीक्षा- अमित वधवानी

रिवेंज- एम. इकराम फरीदी

रिवेंज. - एम. इकराम फ़रीदी, समीक्षक- संदीप नाइक

श्री एम. इकराम फरीदी जी द्वारा लिखित “रिवेंज” रवि पॉकेट बुक्स, मेरठ द्वारा प्रकाशित है।

उपन्यास का मूल्य ₹80/- है, तथा उपन्यास कुल 254 पृष्ठों का है| इसमें आरम्भ के तथा लेखकीय के पृष्ठों को छोड़ दिया जाए तो उपन्यास का कथा भाग कुल 248 पृष्ठों का है।

उपन्यास का मुखपृष्ठ कलात्मक है तथा कथावस्तु का बोध करवाता है। मुखपृष्ठ पर, चाकू के फल में अपना प्रतिबिम्ब देख कर लिपिस्टिक लगाती हुई लड़की का चित्र है। शीर्षक ‘रिवेंज’ और ऐसे मुखपृष्ठ को देख कर यह सहज पता चलता है की कहानी किसी जवान लड़की द्वारा लिए जाने वाले प्रतिशोध (रिवेंज) पर आधारित है। कहने का तात्पर्य यह की मुखपृष्ठ तर्कसंगत, कलात्मक एवं आकर्षक है।

फरीदी जी ने लेखकीय मात्र दो पृष्ठों का लिख कर पाठकों को बोर होने से बचाया है। कम पर चुनिन्दा शब्दों में जो सटीक बात कही जा सकती है वह पूरा निबंध लिख देने पर भी नहीं कही जा सकती। मैं फरीदी जी से यहाँ पूर्णतया सहमत हूँ की किसी फनकार को उसके फन के इस्तेमाल का वातावरण मुहैया होना भी ईश्वर के ही बूते की बात है। पर मैं फरीदी जी से यहां थोड़ा असहमत हूँ की भविष्य में उनके द्वारा लिखे जाने वाले उपन्यासों में ‘द ओल्ड फोर्ट’ और ‘ए TEरेरिस्ट’ की टक्कर का एक भी न हो। क्योंकि लेखक तो अपना हर उपन्यास उतने ही समर्पण और लगन से लिखता है जितने समर्पण और लगन से उसने अपने पिछले उपन्यास लिखे थे, पर कौनसा उपन्यास ‘कालजयी रचना’ बन जाए ये वो स्वयं नहीं बता सकता। कहने का तात्पर्य ये की अभी तो फरीदी जी के कुल पांच ही उपन्यास आए हैं, अभी बहुत लंबा सफ़र तय करना है उन्हें, तो उनकी लेखन शक्ति की चरम सीमा अभी बाकी है।

रिवेंज में कथाकथन शैली उत्तम है, विशेष कर तेज रफ़्तार रहस्य-रोमांच से भरपूर उपन्यासों के लिए आदर्श है। फरीदी जी अपनी कल्पनाएं पाठक के मन में उभारने में सफल रहे। कहीं कोई ऐसा अनावश्यक विस्तृत वर्णन या सीन (दृष्य) नहीं है जो बोर करे या कहानी की गति को धीमा करे। न ही कहीं कोई शब्द, वाक्य या सन्दर्भ ही ऐसे हैं जिनको समझने में पाठक का ध्यान कहानी की मुख्यधारा से भंग होता हो।

एक विशेष बात ये की फरीदी जी ने सभी पात्रों के रंगरूप की विस्तृत व्याख्या करने में स्थान और समय व्यर्थ नहीं किया है, अधिकतर पात्रों के रंगरूप की व्याख्या कम पर सटीक शब्दों में कर शेष पाठक की कल्पनाशक्ति पर छोड़ दिया है। जैसे मोनू, चेतना, शैलेष, ज्योतिका, सुधीर और प्रेमवती के रंगरूप की व्याख्या उतने विस्तार से नहीं की गई है जितने विस्तार से जासूस सुभाषचंद कौशिक, इंस्पेक्टर उग्रसेन, इंस्पेक्टर अब्दुल करीम, मैना, प्रकाश, अंशु और तांत्रिक बाबाओं के रंगरूप की की गई है। मेरे विचार में वैसे भी पाठक की कल्पनाओं के लिए हर जगह शब्द मुहैया करवाने की आवश्यकता नहीं होती, कईं जगह माहौल को समझ कर पाठक ही अपनी कल्पनाशक्ति का इस्तेमाल करे तो वो ज्यादा शीघ्रता से कल्पना कर आगे बढ़ सकता है। इससे किसी पात्र को समझने में पाठक के पढ़ने की लय और गति भी बाधित नहीं होती, और पाठक कहानी के बहाव के साथ बहता चला जाता है। यही ‘एक ही बैठक में पठनीय’ उपन्यासों की विशेषता होती है, जो की “रिवेंज” में है।

भाषा तथा शब्दों का चुनाव ऐसा है की पाठक कहानी में घटित होने वाली घटनाओं व कहानी के माहौल को महसूस कर सकता है। और यही पाठक के लिए सबसे आनंददायी होता है।

फरीदी जी ने अंशु के कथित भूत की आवाज को ‘पत्थर पर पत्ती की रगड़’ जैसा बताया है। कहने का तात्पर्य यह कि आवाजों तक को पाठक के मन में उभारने की मेहनत फरीदी जी ने की है। परंतु शब्दों का ये चुनाव ऐसा है कि हर कोई आसानी से इस आवाज की कल्पना नहीं कर सकता, विशेष कर तब जबकि उस आवाज को किसी के बोलने-हंसने  जैसा बताया गया हो।

तो, कहानी एक विधवा मैना के “रिवेंज” की है जो अपने पति प्रकाश व बेटे अंशु की मौत का बदला लेने की ठान लेती है। मैना मानती है कि उसके पति व बेटे का खून उसकी भौजाई ज्योतिका ने ही षड्यंत्र रच कर करवाया है, ताकि उसका परिवार न फले फूले और उसे संपत्ति से कोई हिस्सा न मिले।
मैना का यह दावा है कि उसकी भौजाई ज्योतिका ने प्रकाश की शादी न होने देने के लिए एक से एक षड्यंत्र रचे थे। फिर भी ज्योतिका अपने षड्यंत्रों में सफल नहीं हो पाई और मैना प्रकाश से शादी करके घर में आ गई। इस शादी से उन्हें एक बेटा भी हुआ, जिसका नाम अंशु था।
पर मैना के अनुसार, ज्योतिका किसी तरह प्रकाश व अंशु को मरवा देने में सफल हो जाती है।
कुछ समय बाद ज्योतिका के बेटे मोनू को मैना के बेटे अंशु का भूत दिखाई देता है, और अंशु का भूत ज्योतिका की बेटी चेतना को फोन कर बताता है कि उसके भाई मोनू की मौत हो जाएगी। इस पर ज्योतिका का परिवार पहले तांत्रिक बाबाओं की सहायता लेता है कि वे अंशु के भूत को भगा दें। फिर जान से मारने की धमकी होने के कारण वे पुलिस की सहायता लेते हैं, और पुलिस के रवैये से संतुष्ट न होने पर जासूस सुभाषचंद कौशिक की सहायता लेते हैं। इंस्पेक्टर उग्रसेन द्वारा पूछताछ किये जाने पर मैना मोनू की मौत का निश्चित दिन भी बता देती है, और चुनौती भी देती है कि रोक सको तो रोक लेना। परन्तु सबूतों के अभाव में इंस्पेक्टर उग्रसेन मैना के खिलाफ कुछ नहीं कर पाता।
पुलिस की कड़ी सुरक्षा के बावजूद मोनू मर जाता है, पुलिस और जासूस सुभाषचंद कौशिक को ढूंढे कोई क्लू नहीं मिलता। इस बार इंस्पेक्टर उग्रसेन मैना को गिरफ्तार तो करता है परन्तु फिर सबूतों के अभाव में उसे विवश होकर मैना को छोड़ना पड़ता है।
फिर कुछ दिनों बाद अंशु का भूत ज्योतिका को फोन कर उसकी बड़ी बेटी चेतना की मौत का निश्चित दिन बताता है। इस बार चेतना को सुरक्षा की दृष्टि से उस दिन थाने में ही रखने का निर्णय लिया जाता है।
अनजाने में मैना के प्यार में पड़ रहा शायरी का शौकीन इंस्पेक्टर उग्रसेन मैना से प्यार का इज़हार तो कर देता है परन्तु उसके सामने ये खूनी खेल रोक देने की शर्त भी रखता है। पर मैना नहीं मानती, और इंस्पेक्टर उग्रसेन कर्तव्य को प्राथमिकता देते हुए मैना को चेतावनी देता है कि सबूत मिलते ही वह मैना को फांसी के फंदे पर झूलवा कर ही दम लेगा।
पर थाने पर कड़ी सुरक्षा में भी चेतना की मृत्यु हो जाती है। इस बार उन्हें चेतना की मृत्यु का कारण भी पता चल जाता है और कुछ क्लू भी मिल जाते हैं फिर भी वे क़ातिल तक पहुंचने के लिए काफी नहीं होते। मैना के खिलाफ भी ऐसा कोई सबूत नहीं मिलता जिससे ये साबित हो पाए की वो ये सब खुद कर रही है या किसी से करवा रही है।
अब ज्योतिका के परिवार पर ये खतरा मंडराने लगता है कि मैना उसके पूरे परिवार को खत्म करके ही अपना ‘रिवेंज’ पूरा करेगी।
तो, पुलिस या जासूस सुभाषचंद कौशिक में से कौन सफल होता है क़ातिल को पकड़ने में?
क्या मैना के खिलाफ सबूत मिल पाते हैं?
क्या मैना अपना ‘रिवेंज’ पूरा कर पाती है?
इन्हीं सवालों के जवाब क्लाइमेक्स में मिलते हैं।

उपन्यास जबरदस्त था व एक ही बैठक में पठनीय था। इस उपन्यास की खूबी यह है कि पढ़ने वाले को यह पहले पृष्ठ से ही जकड़ लेता है और अंत तक ले जा कर ही छोड़ता है।

पूरे उपन्यास में संवाद अत्यंत मनोरंजक हैं, कहीं कोई पकाऊ और लंबा संवाद नहीं है। विशेष उल्लेखनीय इंस्पेक्टर उग्रसेन और मैना के बीच के संवाद, इंस्पेक्टर उग्रसेन और अंशु के भूत के बीच के संवाद, मैना के प्यार में पड़े इंस्पेक्टर उग्रसेन का शायराना अंदाज़ आदि बहुत मज़ेदार और खूबसूरत बन पड़े हैं। जासूस सुभाषचंद कौशिक के संवाद भी उसकी चिर परिचित शैली में मनोरंजक लगे।

पर ‘रिवेंज’ को पढ़ कर मैं कह सकता हूँ कि ‘रिवेंज’ मुझे ‘गुलाबी अपराध’ की टक्कर का नहीं लगा। ‘रिवेंज’ की तुलना ‘द ओल्ड फोर्ट’ और ‘ए TEरेरिस्ट’ से नहीं की जा सकती, क्योंकि इन दोनों का ही विषय बिलकुल अलग था। पर ‘गुलाबी अपराध’ और ‘रिवेंज’ दोनों ही मर्डर मिस्ट्री हैं। और ‘रिवेंज’ मुझे ‘गुलाबी अपराध’ की टक्कर का इसलिए नहीं लगा क्योंकि ‘गुलाबी अपराध’ के मुक़ाबले ‘रिवेंज’ में क़ातिल को पहचानना कहीं ज्यादा आसान रहा।

पेज नंबर 63 पर जासूस सुभाषचंद कौशिक की एंट्री के साथ उसके व्यक्तित्व की व्याख्या मुझे बहुत पसंद आई। “ऐसा सुकून चेहरे पर व्याप्त रहता था मानो जीवन की सभी मनोकामनाएं प्राप्त कर ली हों..” और “उसकी ठंडी आंखें दुनिया के हर भ्रम को जान लेने की चुगली करती थीं..” विशेष उल्लेखनीय हैं। जासूस सुभाषचंद कौशिक का व्यक्तित्व मुझे अनुकरणीय लगा। परन्तु, आगामी उपन्यासों में जासूस सुभाषचंद कौशिक को भी किसी से प्यार होते देखना चाहूंगा।

और एक बात जो मैं फरीदी जी के उपन्यासों के बारे में पहले भी कह चुका हूं, वो ये की इनके हर उपन्यास में भरपूर मनोरंजन के साथ कोई न कोई सीख भी होती है। ‘रिवेंज’ में नशे, अंधविश्वास और संपत्ति के लालच में बर्बाद होते परिवार पर सीख मौजूद है। इस हेतु फरीदी जी की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है।

पर कानूनी मसले पर मैं एक बात बताना चाहता हूं। यह कहना गलत है कि, संपत्ति में बहू का कोई अधिकार नहीं होता है और संपत्ति का मालिक या तो पति होता है या फिर बच्चे। किसी निःसंतान विधवा का संपत्ति के उस हिस्से में अधिकार होता है जो हिस्सा उसके पति को जीवित रहते मिलता। इस हिस्से के लिए वह अदालत में मुकदमा भी दायर कर सकती है। और इस हिस्से पर देवर या कोई भी व्यक्ति स्टे/निषेधाज्ञा नहीं ले सकता। न ही ये हिस्सा देवर के बच्चों को मिल सकता है।
हां ये बात अलग है कि विधवा बहू यदि संपत्ति विभाजन से पहले पुनर्विवाह कर ले तो उसका पहले के ससुराल की संपत्ति के किसी भी हिस्से में कोई अधिकार नहीं रहेगा।

मेरी नज़र में उपन्यास पैसा वसूल है। मैं ‘रिवेंज’ को 07/10 अंक देता हूं।

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समीक्षा- संदीप नाइक