Tuesday, 13 February 2018

खोया- खोया चाँद- ओमप्रकाश राय यायावर

समीक्षा- "खोया खोया चाँद"

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आदरणीय मित्र ओम प्रकाश राय 'यायावर' सर्वप्रथम आपको इस कृति के लिए हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।
आप और आपका उपन्यास अनंत गगन की ऊंचाइयों तक पहुँचें।
हम कोई लेखक तो हैं नहीं और न ही हमारे पास शब्दों का है साथ ही साथ लेखन की कला कुशलता भी नहीं है फिर भी एक छोटी सी समीक्षा पाठक के हैसियत से लिख रहे हैं।
एक खास बात ये भी है दस घंटे अनवरत खोये हुए चाँद को हमने ढूंढा तब कहीं जाकर पचमढ़ी में मिला।
वैसे पूरी की पूरी कहानी भावनात्मक, प्रेम, विरह और प्रेरणादायक तथ्यों से होकर गुजरती है। कथा, कथानक और चरित्र सब का सब सर्वोत्तम है।

पाठक बन कर किसी कहानी को पढ़ने का अपना अलग ही मजा होता है, सभी दृश्यों में स्वयं खोजना , सबकुछ मानो जीवन्त हो रहा है,अपार हर्षोल्लास, कभी प्रेम तो कभी पीड़ा और मन में अनायास चंचलता बनी रहती है।

मैनें सही सुना था जो मजा बनारस में है वो कहीं भी नहीं है, इसका अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं-
दो गज जमीन होगी, एक खुला आसमान होगा।
साथ में आप होंगे और बी एच यू का दिलकश जहान होगा।।
-खोया खोया चाँद

इन पंक्तियों में बनारसीपन, चुहलबाजी, कुछ मटरगश्ती मालूम होती है।

छोटे छोटे अंश में बनारसीपने को जानते हैं -

सदफ और निहाल के इर्द गिर्द कहानी परिक्रमा करती हुई नज़र आयेगी। जहाँ सदफ बहुत ही चंचल, समझदार और मुंहफट मुस्लिम समुदाय की लड़की है वहीं निहाल भोला, बुद्धिमान और ध्यान रखने वाले व्यक्तित्व का व्यक्ति हिन्दू समुदाय से है।

निहाल पी सी एस की तैयारी इलाहाबाद से छोड़ कर बनारस बी एड करने आते हैं और कहते हैं -

ग्रैजुऐशन करने बाद बी एड करना उतना ही जरूरी होता है जितना कि मरने के बाद तेरहीं।
-खोया खोया चाँद

यहां सदफ से उनकी मुलाकात, बात और चुहलबाजी के साथ प्यार भी हो जाता है।
खैर लेखक ने बनारस के प्रसिद्ध दार्शनिक स्थलों का बखूबी वर्णन किया है जैसे अस्सी घाट, गंगा , काशी विश्वनाथ मंदिर इत्यादि, सब कुछ हम ही बता देंगे तो आप उपन्यास पढ़ेंगे ही नहीं।

कवि और लेखक में अन्तर जानना और पहचानना हो तो यायावर जी के द्वारा सदफ का सौन्दर्य वर्णन देखिए।

''हर सवाल का जवाब सवाल नहीं होता,
आसमां काहर चमकता सितारा बेमिसाल नहीं होता।
ये सच है कि मौन सर्वोत्तम भाषण है,
पर हर बार चुप रहना मिसाल नहीं होता।।"

-खोया खोया चाँद

थोड़ी सी बात और उपन्यास पढ़ने के पश्चात मेरा व्यक्तिगत अनुभव कहानी के शुरुआत में बी एच यू कैंपस और छात्रावास में निहाल समेत उनके साथियों की चुहलबाजी, चाय की चुस्कियाँ और मेस पर खाने के चक्कर में लफ्फाजी लाजवाब लगी परन्तु गालियों को शामिल करना मुझे अजीब लगा मतलब बिल्कुल भी पसंद नहीं आया।
सदफ के साथ निहाल के बिताए हुए पलों का भाव पक्ष की दृष्टि से अद्वितीय अद्भुत वर्णन इसके लिए आपको साधुवाद।
अन्तिम बात पूरे उपन्यास की सबसे महत्वपूर्ण पहलू और मेरे दृष्टिकोण से सबसे अहम बात मुहब्बत को जिस्मानी संबंधों बिल्कुल परे एहसासों से जोड़ना बहुत ही खूबसूरत और दिल से अच्छा लगा और मेरे समझ जो निहाल ने किया वो सच्ची मुहब्बत है।

उपन्यास पढ़ते पढ़ते मुझे  जाने कितनी बार रोना 😢 आया, यदि इस कहानी के किरदार वास्तविकता में हैं तो मैं सदफ और निहाल से मिलना चाहूँगी। मेरे मन इन दोनों को लेकर न जाने क्या क्या चल रहा है! मेरे प्रश्नों के उत्तर लेखक के अलावा निहाल व सदफ ही दे सकते हैं।

परम मित्र ओम प्रकाश राय 'यायावर' को ' खोया खोया चाँद ' के लिए हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।
हम आशा करते हैं आप इसी प्रकार अन्य कहानियों को हम पाठकों तक पहुंचा कर हमें अभिभूत करते रहेंगे।

- समीक्षा
अंशिका शर्मा
11/02/2018

Wednesday, 17 January 2018

वीर की विजय यात्रा- दिनेश चारण

वीर की विजय यात्रा- दिनेश चारण

फैंटेसी, हिस्टोरिकल फिक्शन ने प्रगति करते करते इतनी तरक्की कर ली है कि कहीं न कहीं साहित्य की मुख्य धारा को रिप्लेस ही कर दिया है।नए नए लेखक जुड़ते जाते हैं और नए नए कीर्तिमान गढ़ते जाते हैं।इन्हीं लोगों में से अपने पहले उपन्यास के साथ दस्तक दी है नए नवेले लेखक दिनेश चारण ने।लेखक को उनकी उपलब्धियों के लिए बधाई।
      
कथानक-कथानक सरल है और रोचक है।पाठक को बाँधे रखने में सक्षम है।लेखक ने काल्पनिक स्थान,पात्रों के साथ कहानी का अच्छा तानाबाना बुना है।130 पेज में फैले इस कथानक में एक और विशेषता है वह यह कि ये बच्चों के साथ साथ बड़ों के पढ़ने के लिए भी है।परंतु इस उपन्यास में बड़ों वाली पठनीयता बहुत पीछे छूट जाती है और आज के परिपेक्ष्य में कथानक के स्तर का विश्लेषण करने के बाद यह बच्चों वाली ही पुस्तक प्रतीत होती है।बच्चों के लिए यह जितनी रोचक हो सकती है उतना बड़ों के लिए नहीं।

भाषा-भाषाई तौर पर भी लेखक उन्नीस नजर आते हैं।कहानी के काल,क्रम आदि को देखते हुए भाषा-शैली पूर्णतया सटीक नहीं कही जा सकती।लेखक कठिन शब्दों से बचे हैं और समझ में आने योग्य लिखने का यथासंभव प्रयास किया है।यह एक अच्छी बात है।

पात्र-पात्रों की भरमार नहीं है एवं सभी पात्रों के साथ पूरा पूरा न्याय हुआ है।वीरसेन जो कि कहानी का मुख्य नायक है वह पूरे उपन्यास में छाया हुआ है।एक अच्छे मित्र की तरह राजकुमार प्रद्युम्न में उसका बखूबी साथ निभाया है।इसके अतिरिक्त बिलाल खान,कासम खान आदि भी मुख्य पात्र हैं जिन्होंने कहानी का भार उठाया है।सहायक पत्रों की भी अच्छी भूमिका है।

संपादकीय पक्ष-इस उपन्यास की सबसे बड़ी कमजोरी इसका संपादकीय पक्ष ही है।पूरे उपन्यास में गिने चुने पृष्ठों को छोड़ दें तो हर पृष्ठ में वर्तनी,विराम चिह्न आदि में ढेरों गलतियाँ हैं।सूरज पॉकेट बुक्स जैसे तेजी से उभर रहे प्रकाशन संस्थान को अपना संपादकीय पक्ष काफी मजबूत करने की आवश्यकता है।

अन्य-पृष्ठ 48 और 49 को ध्यान से पढ़ा जाय तो कहीं भी दोनों गुप्तचरों को शंकर अपना नाम नहीं बताता और यह उन सबों की पहली मुलाकात भी है जहाँ दोनों गुप्तर शंकर से अपरिचित होते हैं  एवं शंकर उन दोनों से।परंतु फिर भी एक बार गुप्तचर शंकर को उसके नाम से बुलाते हैं।इसके अतिरिक्त ध्यान देने वाली बात यह भी है कि दो जगहों पर लेखक ने आजकल प्रचलित बिहारी भाषा का प्रयोग किया है जबकि उस समय इस भाषा का विकास संभवतः नहीं हुआ था।

निष्कर्ष यह कि इस उपन्यास को एक बार पढ़कर देखा जा सकता है।आप निराश नहीं होंगे।संपादक पक्ष मजबूत किया जा सकता था था।साथ ही कथानक को 10-15 पेज कम भी किया जा सकता था।उसमें कहानी ज्यादा कसी हुई लगती।लेखक की शुरुआती रचना है,यह बात मुखरित होती रहती है।कुछ बिंदुओं पर लेखक को परिपक्व होने की आवश्यकता है।लेखक से उम्मीदें बहुत हैं।हाँ कवर काफी उम्दा बन पड़ा है उसके लिए पूरी टीम बधाई के पात्र हैं।पेज की क्वालिटी भी बहुत अच्छी है।इसको देखते हुए मूल्य वाजिब कहा जा सकता है।उम्मीद है इसके अगले प्रकाशन में संपादक वर्तनी आदि को कम करने का प्रयास करेंगे।लेखक को अपने अगले किताब के लिए शुभकामनाएं।।

समीक्षा
अभिषेक कुमार

Sunday, 14 January 2018

आहुति- कुशवाहा कांत

आहुति- कुशवाहा कांत
 
सामाजिक उपन्यासकार कुशवाहा कांत का उपन्यास आहुति सम्राट अशोक के जीवन का एक काल्पनिक पक्ष हमारे सामने प्रस्तुत करता है।
   सम्राट अशोक वृद्धावस्था में अपनी श्रेष्ठ परिचारिका से शादी कर लेते हैं। जवान परिचारिका और वृद्ध राजा का मिलन तन का ही होता है मन का नहीं।
    सम्राट अशोक के अस्वस्थ होने पर सारा शासन कार्य परिचारिका के हाथ में आने पर वह अपनी कुटिल प्रवृति जाहिर कर देती है और जिसकी सजा अशोक के पुत्र कुणाल को भुगतनी पङती है।
  कुणाल की श्रत्राणी पत्नी कांचन इस षडयंत्र का पता चलाकर विद्रोह करती है और अंत में अन्याय का पर्दाफाश करती है।

यह उपन्यास बहुत ही रोचक है। पाठक एक बार आरम्भ करने पर समापन करके ही उठता है। इसकी कहानी काल्पनिक होकर भी सत्य के नजदीक है।

उपन्यास- आहुति
लेखक- कुशवाहा कांत

लेखक की अन्य जानकारी यहाँ उपलब्ध है-
http://sahityadesh.blogspot.in/search/label/कुशवाहा%20कांत?m=0

Thursday, 11 January 2018

तुरूप का इक्का- गजाला

जासूस गजाला प्रियदर्शी का कारनामा।
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    गजाला जी का उपन्यास तुरूप का इक्का पढने को मिला, यह उपन्यास एक एक्शन उपन्यास है। एक्शन उपन्यास पढने वालों को काफी पसंद आयेगा।
यह गजाला जी का पहला उपन्यास है
    
   उपन्यास की कहानी की बात करें तो यह कहानी इजराइल और फिलिस्तीन के मध्य चल रहे संघर्ष पर आधारित है। जहाँ दोनों देश एक- दूसरे पर अपनी विजय दर्शाने के लिए संघर्ष करते हैं तो वहीं कुछ निर्दोष इस संघर्ष की बलि चढ जाते हैं।
   ऐसे ही एक निर्दोष को बचाने के लिए गजाला प्रियदर्शी पहुंच जाती है इजराइल। लेकिन वहाँ फंस जाती है सत्य और असत्य के बीच।
   
जासूस गजाला प्रियदर्शी फिलिस्तीन देश में एक लङके को बचाने के लिए जाती है पर वहाँ जाकर खुद फंस जाती है और वहाँ एक छोटी सी बच्ची अदिया भी मिलती जिसे बचाने के लिए गजाला दुश्मनों से भीङ जाती है और अंत में दुश्मनों को खत्म कर जीत जाती है।

पूरे उपन्यास में एक्शन दृश्यों की भरमार है, कई- कई जगह तो मारधाङ तीन- चार पृष्ठ तक लगातार चलती है। तीन सौ पृष्ठों के उपन्यास में से लगभग सौ पृष्ठ तो एक्शन से भरे हुये हैं।

   लेखिका के प्रथन उपन्यास को पढकर जहां उनकी प्रतिभा का पता चलता है वहीं कहानी के स्तर पर उपन्यास मध्यम स्तर तक भी बहुत कठिनता से पहुंचता है। उपन्यास को आवश्यकता से अधिक विस्तार देकर कहानी को और भी कमजोर कर दिया।
    हर पांच- दस पृष्ठ कर पश्चात पाठक को वही मारपीट वाले दृश्य पढने को मिलते हैं।
   उपन्यास बहुत ही अच्छा है, अच्छा उपन्यास पाठक को पसंद आयेगा। इसकी कहानी दो देशो पर आधारित है जो पढने वाले को अच्छी लगेगी।

प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स- मेरठ

Friday, 29 December 2017

ट्रेजडी गर्ल- एम इकराम फरीदी

ट्रेजडी गर्ल- एम. इकराम फरीदी। उपन्यास समीक्षा।

मो. इकराम फरीदी जी लिखित “ट्रेजडी गर्ल” धीरज पॉकेट बुक्स, मेरठ द्वारा प्रकाशित है।

ट्रेजडी का अर्थ है कोई त्रासदी या दुःखद घटना। उपन्यास का शीर्षक बताता है कि कहानी ऐसी लड़की पर है जिसके साथ कोई त्रासदी घटित होती है। हिंदी उपन्यासों का शीर्षक भी हिंदी ही होना चाहिए। हिंदी या हिंदी में प्रयुक्त उर्दू शब्दों की सहायता से कईं श्रेष्ठ शीर्षक बन सकते हैं।

शीर्षक, मुख्य आवरण पर एक ओर देखती हुई लड़की का चित्र जिसके बाल बिखरे हुए हैं, तथा आवरण की रंग सज्जा में में बोझिल रंगों की प्रधानता, दुःख द्योतक लगते हैं।

सच कहूँ तो ये उपन्यास विशुद्ध जासूसी, रहस्य व रोमांच विधा के रसिक पाठकों के लिए है ही नहीं। कहानी में जासूसी के तत्व तो हैं, परंतु अंत तक कोई बड़ा रहस्योद्घाटन नहीं है। यह एक विशुद्ध त्रासदी/दुःख कथा है। हाँ, त्रासदी या दुःख कथाएं पसंद करने वालों के लिए इसमें भरपूर मसाला है।

कहानी एक लड़की सुरभि की है जो अपने कॉलेज टाइम में अपनी एक दोस्त युमि की सलाह पर वो घृणित पेशा अपना लेती है जिसमें रोज़ इज़्जत का सौदा करना होता है। क्योंकि पिता के देहांत के बाद आर्थिक स्थिति बहुत खराब हो गई थी और उसे अपने भाई को इंजीनियर बनवाना था। घर वालों को यह बता कर की उसकी एक दोस्त ने उधार दिए हैं वह अपने ‘धंधे’ की कमाई घर में सौंपती है।
परंतु वह ये सब ‘सीमित रूप’ में करती है, भाई की पढ़ाई पूरी होने के तथा उसके नौकरी लगने के बाद खुद के लिए अमीर घर का अच्छा रिश्ता मिलते ही शादी कर एक पतिव्रता के रूप में नए जीवन की शुरुआत कर देती है।
उसे उस धंधे के सौदागरों से बचा कर तथा उस दलदल से निकाल कर घर बसाने में उसका एक दोस्त अजय मदद करता है जो उससे प्यार भी करता है। हालांकि सुरभि भी अजय से प्यार करती थी, पर अजय के गरीब होने, अमीर घर का रिश्ता मिलने तथा खुद को उस धंधे के कारण अजय के लायक न समझ कर वह उस अमीर घर में शादी कर लेती है। अजय फिर भी उसका मददगार तथा शुभचिंतक बना रहता है।
पर नियति को जैसे उसकी खुशहाल वैवाहिक ज़िन्दगी बर्दाश्त न हुई। उसके बीते कल का एक ‘ग्राहक’ संदीप उसकी जिंदगी में पुनः प्रकट हो जाता है और उसकी कुछ पुरानी ‘वीडियो क्लिप्स’ के आधार पर उसके व उसके पति के भयादोहन (blackmailing) का प्रयास करता है। उसका पति एक जासूस सुभाषचंद कौशिक की मदद लेता है। यहां फिर उसका दोस्त व प्रेमी अजय उसका संकटमोचक बनता है।
परंतु अजय के जीवन में ही ऐसी त्रासदी घटित हो जाती है जिससे वही उसके खिलाफ हो जाता है।
क्या अजय अपने प्यार को उसके अतीत से बचा पाने में सफल होता है?
अजय की ज़िंदगी में क्या ऐसी त्रासदी घटित हुई कि वही सुरभि के खिलाफ जाने को विवश हुआ?
क्या अजय की खिलाफत सुरभि की ज़िंदगी को बर्बाद कर देती है?
क्या अजय फिर सुरभि का साथ देता है उसे मुसीबत से निकलने के लिए?
क्या सुरभि को अपनी शादीशुदा ज़िन्दगी बचाने के लिए फिर कोई समझौता करना पड़ता है?
क्या सुरभि अंततः अपनी शादीशुदा जिंदगी को बचा पाने में सफल होती है?
यही सब प्रश्न पाठक की भावनाएं उद्वेलित रखते हैं एवं प्रश्नों का उत्तर पाठक को अंत तक एक-एक कर मिलता है।

फरीदी जी लेखन कला में अपनी दक्षता पहले ही साबित कर चुके हैं। मैंने पहले ‘ए TEरेरिस्ट’ और ‘गुलाबी अपराध’ पढ़े फिर यह ‘ट्रेजडी गर्ल’ पढ़ा। मैं ‘ए TEरेरिस्ट’ और ‘गुलाबी अपराध’ के कारण पहले ही उनका प्रशंसक बन चुका था और उनकी लेखन कला से प्रभावित था। ‘ट्रेजडी गर्ल’ जैसे कथानक फरीदी जी की शैली के उपयुक्त नहीं हैं।

ऐसा नहीं है कि पुरुष ही स्त्री पर दबाव बना सकता है और ऐसा कोई अधिकार उसे पुरुष पर हासिल नहीं है। कईं ऐसी औरतें हैं जो अपने औरत होने का व कानून में मौजूद अनुकूल प्रावधानों का फायदा उठा कर पुरुषों का जीना हराम कर देती हैं।

कोई औरत स्वेच्छा से या किसी लालच के वशीभूत होकर गलत कदम उठा ले, तो ये नहीं कहा जा सकता कि समाज में उसके विरोध की गुंजाइश नहीं है। भाई को इंजीनियर बना कर उसका व घर का स्तर ऊंचा करने के लिए कोई भी ग़ैरकानूनी या अनैतिक काम करना, लालच ही है। वरना कम या बिना पढ़े-लिखे लोग भी सुकून और इज़्ज़त से ज़िन्दगी गुज़ारते हैं, उनकी भी बहन-बेटियों की शादियां अच्छे घरों में होती हैं। धन सम्पन्न घर ही अच्छा हो यह ज़रूरी नहीं।

अमीर पति छोड़ न दे इसलिए फिर अपनी इज़्ज़त से समझौता, ये भी लालच ही है। ऐसी औरतों से वो औरतें अच्छी जो मेहनत-मजदूरी कर लेंगी, बस-रिक्शा चला लेंगी या कोई भी इज़्ज़तदार काम कर लेंगी पर किसी भी प्रकार से इज़्ज़त से समझौता नहीं करेंगी, ऐसी औरतों के लिए किसी के सहारे की मोहताज होना तो बहुत दूर की बात है।

हर कोई, चाहे स्त्री हो या पुरुष, किसी न किसी रूप में अत्याचार का शिकार होता रहता है। पुरुषों पर हुए अत्याचारों को बस प्रचार नहीं मिलता इसलिए समाज इन अत्याचारों से अनभिज्ञ रहता है।

उपरोक्त बातों के आधार पर मैं कहना चाहूंगा कि कहानी तथ्यात्मक एवं तार्किक दृष्टि से बहुत कमजोर है।

संवाद अच्छे हैं, कहानी के अनुरूप हैं तथा कहानी की गति को धीमा नहीं करते। अजय तथा संदीप के बीच के, तथा संदीप के अन्य किरदारों से संवाद मनोरंजक हैं। कहने की गति जासूसी-थ्रिलर उपन्यासों जैसी है। दृश्य, प्रसंग व चरित्र वर्णन सजीव हैं, तथा संवादों की लंबाई यथोचित है।

कहानी का अंत उचित है, इससे बेहतर अंत नहीं हो सकता था। परंतु अंत होने के पूर्व के कुछ प्रसंग अनावश्यक लगे।

उपन्यास में जासूस सुभाषचंद कौशिक का किरदार है, उनकी जासूसी भी है, परंतु कहानी के अंत तक उन पर कुछ खास फोकस नहीं किया गया है। ऐसे पाठक जिन्हें त्रासदी/दुःख कथाएं पढ़ना पसंद है, उन्हें यह उपन्यास पसंद आ सकता है।

मैं उपन्यास को 5/10 अंक देता हूँ। 🙏

- संदीप नाईक
इंदौर (म. प्र.)

Saturday, 16 December 2017

ए TEरेरिस्ट- एम. इकराम फरीदी

ए TEरेरिस्ट
लेखक : एम. इकराम फरीदी(Md Ikram Faridi)
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फरीदी भाई के अब तक पढ़े गए उपन्यासों में मैं इसे 'दी बेस्ट' का ख़िताब देने की सोच रहा हूं। फिर ख़याल आता है कि ऐसा करना कहीं-न-कहीं बाकी उपन्यासों के साथ थोड़ी नाइंसाफ़ी हो जाएगी। वजह ये कि पहले शाया हुए नॉवेल्स अलग-अलग मौजू पर लिखे गए हैं और फरीदी साहब ने अपनी तरफ़ से उन्हें उनकी ज़मीन पर मुकम्मल साफ़गोई से काफ़ी मेहनत करके लिखा है और अपनी तरफ़ से उनको दी बेस्ट बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। यही वजह है कि मैं भी 'ए TEरेरिस्ट' को फरीदी साहब के अब तक शाया हुए नॉवेल्स में दी बेस्ट कहना चाहते हुए भी नहीं कह रहा हूं।

'ए TEरेरिस्ट' किस्सा है नए दौर के उन कमउम्र मोमिन नौजवानों के ऊपर जो एक ख़ास मजहब की ग़लत तरीक़े से तफसीलबयानी के जाल में फंसकर जेहाद का ग़लत मतलब समझ लेते हैं। ये दास्तान है उन मौलानाओं की भी, जो नहीं जानते कि उन्हें उनके ही दीन और मजहब को ग़लत तरीक़े से तबलीग करने के लिए कैसी शातिराना चालें चली जाती हैं जिसमें सियासी ताकतें और दूसरे मुल्क वाले भी शामिल हैं। ये किस्सा है मुल्क में रहने वाले उन अमनपसंद मोमिनों का भी, जो किसी भी कीमत पर अपने मुल्क़ में नफ़रत और दहशतगर्दी का आलम नहीं चाहते और चैन-ओ-सुकून की ज़िन्दगी के हिमायती हैं, जो अपने साथ-साथ दूसरों की ज़िन्दगी को भी महफ़ूज़ देखना चाहते हैं और नफ़रत फैलाने वाली सियासी चालों को बख़ूबी समझकर उसका मुक़ाबला भी करते हैं क्योंकि उनके भीतर भी हुब्बुल वतनी का लहू गर्दिश करता है।

पूरा नॉवेल पैसा वसूल है ख़ासकर मौलाना इज़हार की तक़रीर...वाह वाह, पूछिए मत..! पाई पाई वसूल हो गए। बेहतरीन लुत्फ़! मैं तो जितना पढ़ता जा रहा था उतनी ही हँसी आ रही थी और ताज्जुब भी हो रहा था कि क्या ये वाकया एक ऐसा नॉवेलनिगार लिख सकता है जो ख़ुद मोमिन जमात से ताल्लुक रखता हो? लेकिन हकीकत यही थी। जब-जब मौलाना की तकरीर हुई तब-तब मैं लुत्फ़अन्दोज़ होता रहा और मख़सूस हर्फ़ों और सारे जुमलों का पूरा-पूरा लुत्फ़ लिया। हाँ, हुक्कुल अल्लाह और हुक्कुल इबाद- ये दो चीज़ें मैं नहीं जानता था। इस नॉवेल के ज़रिए मेरी इस जानकारी में इजाफ़ा हुआ।

कहानी में विजय-विकास की मौजूदगी है लेकिन विकास की खूंखारता वैसी नहीं दिखाई गई है जैसी वेद प्रकाश शर्मा जी के नॉवेल्स में हुआ करती थी, यह देखकर काफ़ी अच्छा लगा। विजय को पूरा स्पेस मिला है और वह अपनी सदाबहार टोन में है। उसकी ऊटपटांग हरकतें वैसी ही हैं लेकिन यह सबको मालूम है कि ऐसी ही ऊटपटांग बातें करने वाला और हमेशा अपने निक़ाह कराने की बात करने वाला यह शख़्स बहुत ही टैलेंटेड और माइंडेड है और हमेशा ही पर्दे के पीछे रहकर बड़े-बड़े कामों को अंजाम देता रहता है और इस बात की परवाह भी नहीं करता कि उसके काम का उसे क्रेडिट भी मिले।

भारत के ख़िलाफ़ दुश्मन मुल्क किस तरह यहाँ की सियासी पार्टियों के साथ मिलकर इसे बर्बाद करने की साजिशें बुनते हैं या बुन सकते हैं वह भी बख़ूबी दिखाया गया है। कहानी में जगह-जगह एहसास ही गहराई को शिद्दत से रचा गया है। इतने सलीके से एहसासों की गहराई को दिखाया गया है कि किताब को बिना पूरा किए छोड़ने का मन नहीं होता।

मुखबिर जब अतहर के कमरे की तलाशी लेने जाता है उस सीन से लेकर नॉवेल की रफ़्तार बहुत तेज़ हो जाती है। नयागंज इलाके की गली का मुठभेड़, अतहर की आतंकी वारदात, पुलिस बल से लड़ाई, ब्लैक कमांडो का ऑपरेशन बहुत हैरतअंगेज तरीके से लिखे गए हैं। मौलाना इज़हार का जो अंजाम दिखाया गया है वह बहुत दर्दनाक है, उसे आसान तरीके से भी किया जा सकता था। आख़िर वह भी एक इंसान ही तो है- जन्नत और बहत्तर हूरों के लालच में उसने अपना दिमाग़ ख़राब भले ही कर लिया हो लेकिन होश वाले तो कम-से-कम वैसी दरिंदगी न दिखाएँ। हाँ, देवेंद्र प्रताप और मौलाना इज़हार- इन दोनों का एक ही अंजाम एक साथ वैसा ही दिखाना चाहिए था जैसा कि देवेंद्र प्रताप का दिखाया गया है। ख़ैर, ये मेरी सोच है।

मजहब के नाम पर दहशतगर्दी, अख़लाक़ वाकया, अवॉर्ड वापसी, जे एन यू की घटना, भारत तेरे टुकड़े होंगे....इन सब मुद्दों का जिस मुकम्मल तरीके से ज़िक्र करते हुए हालातों की तफसीलबयानी की गई है उससे फरीदी साहब की आलिम समझ और वाकयों को समझने की लियाकत पता चलती है।

आख़िर में जब मेहविश रोते हुए अपने भाई को सरेंडर करने को कहती है और भाई की सलामती के लिए अपनी ख़्वाहिशों की क़ुर्बानी देने को तैयार हो जाती है, वह वाक़या दिल को छू जाता है। जगह-जगह ऐसे नाज़ुक एहसास रूह को झकझोर देते हैं। मेहविश का कॉलेज प्रोग्राम भी कुछ ऐसा ही रहता है। उस वक़्त एक बाप के दिल पर क्या गुज़रती है, यह शौक़त अली के ज़रिए दिखाया गया है।

मेरे ख़याल से इस मुल्क के हर नौजवान खासकर मोमिनों को यह नॉवेल ज़रूर पढ़ना चाहिए। इससे मजहब, जेहाद, इंसानियत जैसे मुद्दों पर उनकी समझ का दायरा बढ़ेगा और वे बहुत कुछ सोचने पर मजबूर हो जाएंगे।

आख़िर में यही कहना चाहूंगा कि कुछ लोगों को उर्दू अल्फ़ाज़ समझने में दिक्कत पेश आ रही होगी। उनके लिए नॉवेल के आख़िर में 'अ' से लेकर 'अः' तक और 'क' से लेकर 'ज्ञ' तक की हर्फ़ों की कैटेगरी बनाकर या फिर पेज नंबर लिखते हुए उर्दू के मुश्किल अल्फ़ाज़ और उनके हिन्दी मायने लिख देने चाहिए थे जैसा कि सुरेंद्र मोहन पाठक जी के नॉवेल 'हीरा फेरी' में किया गया है।

'ट्रेजडी गर्ल' की समीक्षा भी जल्द ही दूंगा....
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                 समीक्षा-
                              अजीत कुमार शर्मा