Saturday, 21 April 2018

रिवेंज- एम. इकराम फरीदी

रिवेंज और इकराम फरीदी के अन्य उपन्यासों पर चर्चा
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Md Ikram Faridi जी अच्छे शब्दों में कोई कथानक लिख सकते हैं। इसे एक अच्छा संयोग कह सकते हैं कि मैंने उनके पाँचों उपन्यास पढ़ लिए। हालिया प्रकाशित उपन्यास 'रिवेंज' एक शानदार फुल स्पीड नॉवेल है।

             'दी ओल्ड फोर्ट' जैसा एडवेंचर इस उपन्यास में भी शुरू से ही बना रहता है। ओल्ड फोर्ट में तो जगह-जगह सस्पेंस खुलता चला गया है लेकिन 'रिवेंज' की ख़ूबी ये है कि इसमें सारे सस्पेंस को लास्ट में ही खोला गया है।

             'दी ओल्ड फोर्ट' और 'ट्रेजडी गर्ल' में जासूस सुभाष चन्द कौशिक बहुत दमदार अंदाज़ में नज़र आया। लेकिन 'ट्रेजडी गर्ल' में जब 'ट्रेजडी गर्ल' को उसका पति 6 महीने तक अपने गुरू की शरण में भेजता है और वहाँ जब 'शुद्धिकरण' की प्रक्रिया से वह गुजरती है तो व्यक्तिगत रूप से जासूस सुभाष चन्द कौशिक पर मुझे बहुत क्रोध आया और उस 'शुद्धिकरण' के लिए मैंने जासूस को ही पूर्णतः दोषी माना। 'दी ओल्ड फोर्ट' में वही सुभाष चन्द कौशिक उस खौफ़नाक किले से सबको बचा लाता है और इंसानियत की भावना को अपनी जासूसी पेशे की भावना से भी ऊपर रखता है।कथानक के अंत में जब वह ठग तांत्रिक बाबा की धुलाई करता है तो उसकी भावना इस बात की गवाही देती है। फिर वही सुभाष चन्द कौशिक 'ट्रेजडी गर्ल' वाले मामले में इतना मतलबपरस्त कैसे हो गया कि उसने 'ट्रेजडी गर्ल' के पति को सारे राज़ बता दिए? अगर वह राज़ नहीं खोलता तब भी सबकुछ सही हो चुका था। सारा केस हल हो गया था। सबलोग ट्रेजडी से बाहर आ चुके थे। 'ट्रेजडी गर्ल' भी अपने अतीत से पीछा छुड़ा चुकी थी। लेकिन जासूस सुभाष की वजह से ही उसे अपने अतीत के अध्याय से नए सिरे से पुनः दो-चार होना पड़ा। हालांकि कथानक के अंत में उसका मुजरिम के सामने लेक्चर बहुत शानदार लगा फिर भी उसके द्वारा राज खोलने को लेकर उत्पन्न हुई नई ट्रेजडी से मैं बेहद ख़फ़ा था। मेरी शिक़ायत बिना कहे ही दूर हो गई प्रस्तुत उपन्यास 'रिवेंज' में...! जब लगातार दो हत्याएँ जासूस सुभाष चन्द कौशिक की ही मौजूदगी में हो जाती हैं और वह कुछ नहीं कर पाता। उसकी सारी धुरंधरी फ़ना हो जाती है क्योंकि कातिल ने बाकायदा अल्टीमेटम देकर वो क़त्ल किए। इतना धुरंधर जासूस जब दोनों मर्डर केस में पटखनी खा जाता है तब मुझे तो बहुत सुकून मिला क्योंकि 'ट्रेजडी गर्ल' की ज़िन्दगी में उसी के द्वारा राज़ खोल देने पर  सब तरफ़ से दूर हुई ट्रेजडी के बाद नई ट्रेजडी पैदा हो गई। ये कैसी पेशे की वफ़ादारी जो एक थम चुके तूफ़ान को नए रूप में पैदा कर दे? जासूस सुभाष चन्द कौशिक की वजह से 'ट्रेजडी गर्ल' की ज़िन्दगी में आई नई ट्रेजडी का रिवेंज इस हालिया प्रकाशित उपन्यास 'रिवेंज' में तब मिल जाता है जब धुरंधर जासूस होकर भी वह एक नारी के ही समक्ष असहाय हो जाता है और अंत-अंत तक वह उसके सामने अपनी धुरंधरी नहीं झाड़ पाता। मैं जानता हूँ कि जिन पाठकों ने 'ट्रेजडी गर्ल' नहीं पढ़ी होगी वो मामले को उतना नहीं समझ पा रहे होंगे लेकिन यहाँ मैं एक बात क्लीयर कर दूँ कि 'ट्रेजडी गर्ल' और 'रिवेंज' बिल्कुल दो अलग-अलग कहानियाँ हैं और उनका आपस में कोई संबंध नहीं है। मैंने जो बातें लिखी हैं उन पर शायद...हाँ, शायद लेखक महोदय ने भी उस एंगल से नहीं सोचा होगा।

              'रिवेंज' एक ऐसी रहस्य और सस्पेंस वाली कहानी है जिसमें कातिल लगातार हत्याएँ करने का इरादा रखता है। न सिर्फ़ इरादा ही रखता है बल्कि उसे अंजाम देने के लिए बाकायदा भावी मकतूल के घर वालों को पहले से अल्टीमेटम देता है। यही नहीं, बल्कि उसका दुस्साहस इतना है कि बात आन पर आने पर वह यह अल्टीमेटम पुलिस को भी देता है और पुलिस को खुला चैलेंज देता है कि इस मर्डर को पुलिस भी नहीं रोक पाएगी। पूरा महकमा इस संभावित हत्या को रोकने में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देता है लेकिन कातिल अपने मकसद में कामयाब हो जाता है। दूसरी बार भी ऐसा ही होता है और कातिल फिर से चैलेंज देकर नया क़त्ल कर देता है। तयशुदा दिन को...! पुलिस के लिए ये एक चैलेंजिंग केस बन जाता है लेकिन मर्डरर का कोई क्लू नहीं मिलता। वो सामने होते हुए भी नहीं होता। उससे भी बड़ी और चैलेंजिंग बात ये होती है कि ये हत्याएँ धुरंधर जासूस सुभाष चन्द कौशिक की मौजूदगी में हो जाती हैं और उसे भी अल्टीमेटम की पूरी जानकारी रहती है लेकिन वह इन घटनाओं को रोक नहीं पाता और उसकी सारी धुरंधरी हवा हो जाती है।

            जो पाठक/पाठिका सुभाष चन्द कौशिक की कार्यक्षमता पर सवालिया निशान लगते और उसकी धुरंधरी के धुर्रे उड़ाती हुई घटनाओं को पढ़ने के तलबगार हैं वो 'रिवेंज' पढ़ें।

           'रिवेंज' में मैना का किरदार बहुत दमदार है और सब पर भारी है, लास्ट के सीन की बात छोड़ दें तो सुभाष चन्द कौशिक पर भी भारी है। इसके अलावा पेज नंबर 142 से 146 तक मैना और उग्रसेन के बीच का प्रसंग और प्रसंगानुकूल शायरी का मेयार पाठकों के लिए उपन्यास में वक्त खपाने की कीमत अदा कर देता है। खास बात यह भी रही कि उपन्यास का एडवेंचर शुरू से लेकर अंत तक कहीं भी कम नहीं होता और पाठक को जल्द-से-जल्द अंत जानने की जिज्ञासा बनी रहती है। इसके लिए लेखक को विशेष बधाई...👍

               मैं अपनी बातें रखने के वक्त कमियाँ निकालने के लिए भी बदनाम हूँ इसलिए यहाँ भी अपने इस बेतकल्लुफ़ी पर आमादा हुए बग़ैर नहीं रह पाऊंगा। तो अब आते हैं उपन्यास 'रिवेंज' की कमियों पर....

               'ए TEरेरिस्ट' में प्रिंटिंग मिस्टेक न के बराबर था जबकि 'रिवेंज' में ऐसे मिस्टेक्स हैं।

                (1) कथानक की शुरुआत में ही पेज नंबर 7 पर ऊपर की दूसरी लाइन में मोनू की उम्र 14 साल लिखी गई है जबकि पेज नंबर 53 पर 15 वर्ष बताई गई है।

                (2) मोनू के भाई का जगह-जगह पर नाम 'शैलेष' लिखा गया है। मेरे ख़याल से 'शैलेश' सही होगा।

                (3) पेज नंबर 37 पर चेतना, ज्योतिका से पहली बार सुभाष चन्द कौशिक को फोन लगाने को पूछती है और फोन लगाती भी है जबकि आगे पेज नंबर 49 पर पुनः बताया गया है कि चेतना, ज्योतिका के निर्देश पर सुभाष चन्द कौशिक को पहली बार फोन लगाती है।

                (4) पेज नंबर 235 पर लिखा गया है कि मिशन पूर्णतः 'असफल' रहा था जबकि वहाँ मिशन को पूर्णतः 'सफल' रहा था- ये लिखा जाना चाहिए था।

.......और भी कमियाँ हो सकती हैं। मुझे जो याद रहीं, वो लिख दिया ताकि लेखक महोदय इस पर ध्यान देंगे। धन्यवाद....🙏

                                  समीक्षा-   अजीत कुमार शर्मा
                                                  सिवान(बिहार)

Thursday, 5 April 2018

मास्टरमाइंड - शुभानंद

मास्टमाइंड - शुभानन्द

अभी अभी मास्टरमाइंड पढकर खत्म की है... बहुत ही रोमांचक उपन्यास है.  शुभानन्द सर की कलम से निकली कहानी कहीं भी बोर नहीं करती और एक बार पढना शुरू करने के बाद पूरा करके ही उठने को मन करता है.

जावेद-अमर-जॉन की जोड़ी खूब जंची है. रिंकी भी इनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती दिखी. रिंकी की अमर के साथ दुकड़ी देखकर मुझे लग रहा रहा था कि इसे  J A J R सिरीज में लिखने की योजना होगी.

        मास्टरमाइंड का रहस्य अंत तक बना रहा. कहानी बीच बीच में कई मोड़ लेती हुई  मास्टरमाइंड का इशारा दूसरी तरफ कर देती थी और अंत में भी यही लगा था कि  मास्टरमाइंड कोई और है और कहानी का असली मास्टरमाइंड उसका मोहरा मात्र है. कहानी वाकई में रहस्य की परतों से लबरेज है जिसे  जावेद-अमर-जॉन के साथ  रिंकी की चौकड़ी मिलकर उधेड़ डालती है. जावेद जैसा खुर्राट जासूस भी जिके प्लान में फंस जाए वह वाकई में जबरदस्त गेमर होगा...

मेरा तो एक ही मशवरा है कि जिसने भी इसे नहीं पढा है वह एक बार इसे पढे जरूर...

समीक्षक-
सतवीर वर्मा 'बिरकाळी'- No. 9112003232
हनुमानगढ़, राजस्थान

Wednesday, 14 March 2018

एक्सीडेंट:- एक रहस्य कथा

एक्सीडेंट : एक रहस्य कथा- अनुराग कुमार ‘जीनियस’

श्री अनुराग कुमार जी लिखित ‘एक्सीडेंट : एक रहस्य कथा’ सूरज पॉकेट बुक्स, ठाणे (महाराष्ट्र) द्वारा प्रकाशित है।

सूरज पॉकेट बुक्स से श्री अनुराग कुमार जी का यह प्रथम उपन्यास है और मैंने भी श्री अनुराग कुमार जी को पहली बार इसी उपन्यास में पढ़ा है। इसके पूर्व श्री अनुराग कुमार जी का ‘एक लाश का चक्कर’ तुलसी पेपर बुक्स, मेरठ से प्रकाशित हो चुका है, वह मैंने नहीं पढ़ा है।

लेखक की कथाकथन शैली मुझे अच्छी लगी, न तो बहुत जटिल वाक्य हैं और न ही अनावश्यक रूप से डाले गए कठिन शब्द। भाषा सरल एवं बोधगम्य है। भाषा के सरल एवं बोधगम्य होने से पाठक का ध्यान जटिल वाक्यों और कठिन शब्दों को समझने में न भटक कर सिर्फ और सिर्फ कहानी पर रहता है।

उल्लेखनीय ये, कि लेखक महोदय ने दृश्यों का वर्णन जिस तरह से कलात्मक परंतु सरल भाषा में किया है, वह दृश्यों में अतिरिक्त रोमांच पैदा कर देता है। जैसे, “कार की हेडलाइट्स की रौशनी से डर कर कुछ देर के लिए अंधेरे ने अपने पांव कुछ समेट लिए..” और “...सड़क पर लहराई कार पुल की रेलिंग तोड़ कर अंधेरे में एनाकोंडा नज़र आ रही नदी में जा समाई।”, इस तरह के प्रयोग अतिरिक्त रोमांच पैदा कर देते हैं।

कहानी अच्छी है, कहानी के बुनने में किसी प्रकार की जटिलता नहीं रखी गई है। साथ ही पात्र भी सीमित हैं, अनेक अनावश्यक पात्र प्रस्तुत कर पाठक को भरमाने का प्रयास भी नहीं किया गया है। बस अघोरानाथ, नागेश और उर्वशी वाले दृश्य मुझे अनावश्यक लगे, क्योंकि कहानी की मुख्यधारा में इनका या इनके साथ घाटी घटनाओं का कोई विशेष महत्व नहीं था।

तो, कहानी ऐसी है कि, सेठ भानुप्रताप जो कि दो एक्सपोर्ट मिलों के मालिक हैं, को घर आए इंस्पेक्टर दुर्गेश से सूचना मिलती है कि उनके छोटे बेटे ऋषभ की एक कार एक्सीडेंट में मृत्यु हो गई है। घर में उस समय स्वयं सेठ भानुप्रताप, उनका बड़ा बेटा आलोक और आलोक की पत्नी लाली होते हैं। इंस्पेक्टर दुर्गेश द्वारा जो लाश दिखाई जाती है, वह पहचानने लायक न होने पर भी लाश के साथ मिली वस्तुओं के आधार पर परिवारजनों को यह विश्वास करना पड़ता है कि वह लाश उनके ऋषभ की ही है, और परिवारजन उस लाश का अंतिम संस्कार कर देते हैं।
लेकिन ऋषभ तो स्वयं घर आ पहुंचता है, और सभी लोग स्तब्ध रह जाते हैं। दिल्ली से लौटा ऋषभ अपने साथ हुई चोरी की घटना के बारे में बताता है, कि किसी चोर ने उसके सिर पर डंडा मार कर उसे बेहोश कर दिया था और होश में आने पर उसने पाया कि उसका बैग, घड़ी, सोने की चैन व अंगूठी और बनियान व अंडरवियर छोड़ कर बाकी कपड़े तक गायब थे। फिर ऋषभ आगे बताता है कि, एक दोस्त जिसकी शादी में सम्मिलित होने वह दिल्ली गया था, उस दोस्त की मदद से वह बाद में ट्रेन से राजनगर वापस आया है। इससे सबको यही लगता है कि वह लाश उस चोर की थी जो ऋषभ का सामान ले कर भागा था, जिसका एक्सीडेंट हो गया।
परंतु कुछ ही दिनों में ऋषभ की हरकतों से परिवारजनों की खुशी हवा हो जाती है, क्योंकि ऋषभ की अजीबोगरीब हरकतों से घर में सबको यह लगने लगता है कि यह ऋषभ न होकर उसकी जगह आया कोई बहरूपिया है, जिसे किसी विशेष उद्देश्य के साथ उनके घर भेजा गया है। सवाल ये भी उठता है कि क्या किसी दुश्मन ने ऋषभ के बहरूपिये को किसी उद्देश्य के साथ उनके घर में भेजा है?
सेठ भानुप्रताप का बड़ा बेटा आलोक उसी इंस्पेक्टर दुर्गेश की मदद लेने की सोचता है जो ऋषभ की मृत्यु की सूचना ले कर आया था। आलोक की पत्नी लाली पर फ़िदा हुआ इंस्पेक्टर दुर्गेश लाली के करीब आने के लालच में आलोक की बात मान कर मामले की जांच करना स्वीकार कर लेता है।
और यहीं से कईं रोमांचक व हतप्रभ कर देने वाली रहस्यमयी घटनाओं का सिलसिला शुरू हो जाता है। और अंत में एक एक कर सभी रहस्य उजागर होते चले जाते हैं।

श्री अनुराग कुमार जी अपने लेखकीय में कहानी के बारे में दावा करते हैं कि कहानी में जो राज छुपा हुआ है वो अंत से पहले नहीं खुलेगा, और ये चैलेंज है पाठकों के लिए।
तो अनुराग जी, ऐसा है कि पाठकों को चैलेंज उन रहस्य कथाओं में दिया जाना ठीक है जिनमें राज के बारे में कुछ क्लू (संकेत) भी लेखक द्वारा दिये जाते हों। पर आपके उपन्यास का क्लाइमेक्स (चरम) तो हैट में से खरगोश निकाल कर दिखाने जैसा था, जिसमें पाठकों को अपना दिमाग लड़ाने के लिए कोई अवसर ही नहीं था। अंत में पात्रों के बीच वार्तालाप के माध्यम से अचानक रहस्य को उजागर कर दिया गया, इसमें क्लू वाली तो कोई बात ही नहीं थी।
मान लीजिए आपकी कहानी के दो भाग हैं, A व B। यहां B वह भाग है जिसमें पात्रों के आपसी वार्तालाप के माध्यम से रहस्योद्घाटन होकर कहानी का अंत होता है, और A वह भाग है जिसमें आरम्भ से कहानी घटित होती है। आपका B भाग ऐसा है कि यदि इसे पूरा बदल भी दिया जाए तो भी A भाग में किसी प्रकार के संशोधन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
कहने का तात्पर्य ये, कि A भाग में B भाग के बारे में कोई संकेत नहीं हैं। A भाग के समाप्त होते ही B भाग को कहीं भी मोड़ा जा सकता था।
कहानी आरम्भ से ऐसे बुनी हुई होनी चाहिए जिसमें एक ही अंत संभव हो। ऐसा होने पर पाठक को यह परम संतुष्टिदायक लगता है कि इससे अच्छा अंत हो ही नहीं सकता था।

वैसे कहानी में गति अच्छी है, न बहुत तेज न बहुत धीमी। लेखक ने पात्रों के संवाद बोलते समय की भाव-भंगिमाओं और हरकतों का जिस तरह से वर्णन किया है उससे दृश्य अधिक मनोरंजक बन पड़े हैं। संवाद बहुत कलात्मक नहीं हैं, पर कहानी के अनुरूप ही हैं।

आगामी उपन्यासों के लिए श्री अनुराग कुमार जी को अनेकानेक शुभकामनाएं।

मैं ‘एक्सीडेंट : एक रहस्य कथा’ को 6.5/10 अंक देता हूँ।

- समीक्षक
   संदीप नाईक
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एक्सीडेंट:- एक रहस्य कथा

Friday, 9 March 2018

वन शाॅट- कंवल शर्मा

श्री कँवल शर्मा जी लिखित “वन शॉट” रवि पॉकेट बुक्स, मेरठ द्वारा प्रकाशित है|

श्री कँवल शर्मा जी को पहली बार मैंने “वन शॉट” में ही पढ़ा है| उपन्यास का शीर्षक अंग्रेजी में है और शैली भी विदेशी अंग्रेजी उपन्यासों जैसी है| “वन शॉट” पढ़ते-पढ़ते मुझे “श्री ली चाइल्ड जी लिखित जैक रीचर श्रृंखला के प्रथम उपन्यास ‘किलिंग फ्लोर” का स्मरण हो आया|

वैसे कहा जा सकता है की श्री कँवल शर्मा जी की शैली अंतर्राष्ट्रीय स्तर की है, यदि इनके उपन्यास अंग्रेजी में अनुवादित किये जाएँ तो विदेशों में भी पसंद किये जा सकते हैं|

श्री कँवल शर्मा जी की कथाकथन शैली रोचक है और उपन्यास मुझे पसंद भी आया| जैसा की मैं हमेशा कहता हूँ, लेखक की कथाकथन शैली यदि सजीव हो तो पढ़ने में आनंद आता है, वर्ना नहीं| लेखक उचित शब्दों व वाक्यों के मध्यम से यदि अपनी कल्पनाएं पाठक के मस्तिष्क में साकार न कर पाए तो कहानी अच्छी होने के बाद भी पाठक उसका आनंद नहीं ले पाता| लेखक वही सफल होता है जो अपने पाठकों को वैसा महसूस करवा दे जैसा वह चाहता है, तभी उसका लेखन सार्थक होता है|
“सर्द दिसंबर की उस घने कोहरे वाली गहरी स्याह रात में एक काली वैन तेजी से उस हाईवे पर दौड़ी जा रही थी…” इन पंक्तियों के साथ श्री कँवल शर्मा जी के “वन शॉट” का आरम्भ होता है, और इन्हीं पंक्तियों को पढ़ते ही पाठक के मस्तिष्क में चित्र उभरते चले जाते हैं| लेखक महोदय कहानी के हर तत्व का भास करवाने में सफल रहे जैसा की वे चाहते थे| कहानी एक मर्डर मिस्ट्री है, जिसमें रहस्य व रोमांच के तत्वों का उचित समावेश है|

विनय रात्रा एक जांबाज रॉ एजेंट है और जॉर्जिया की राजधानी तिब्लिसी में अपने किसी अभियान पर है, उसे सूचना मिलती है की उसके सगे भाई रोहन रात्रा की मृत्यु हो गयी है| सूचना मिलते ही विनय तिब्लिसी से भारत आने के लिए निकल पड़ता है और पहले दिल्ली अपने मुख्यालय और फिर तुरंत राजनगर पहुँचता है, क्योंकि रोहन राजनगर में रह रहा था| राजनगर आते ही विनय का स्वागत ‘वन शॉट’ से होता है जिसमें वह बच जाता है|
राजनगर आकर विनय को पता चलता है की उसके भाई रोहन की मृत्यु संदिग्ध परिस्थितियों में संभवतया ‘वन शॉट’ से हुई है, जिसके आत्महत्या न होकर हत्या होने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता| विनय स्वयं ही अपने भाई की मृत्यु के कारणों का, एवं उसके हत्यारों का पता लगा कर उसके हत्यारों को सजा देने की ठान लेता है| रोहन की मृत्यु के सही कारणों का पता लगा कर दोषियों को पकड़ने में राजनगर पुलिस प्रशासन का रवैया सुस्त व असहयोगात्मक होता है, साथ ही राजनगर के रसूखदार व ऊँचे ओहदों पर बैठे लोग विनय की राह में बाधक बनते हैं| पर विनय को अपने विभाग के सहकर्मियों से ‘अन-ऑफिशियल’ सक्रीय सहयोग प्राप्त होता है|

कहानी तो तेज गति से आगे बढ़ने लायक है परंतु अनुचित रूप से लंबे संवादों ने गति को बहुत धीमा किया है| विनय द्वारा पूछताछ करने के दृश्यों में संवाद बहुत ज्यादा लंबे हैं| उदाहरणार्थ, रोहन की प्रेमिका सह्याद्री से और चपरासी उजागर से विनय द्वारा पूछताछ करने के दृश्यों में संवाद अनुचित रूप से लंबे हैं| उपन्यास के आरंभ में विनय और उसके सहकर्मी/मित्र नूर अलदीन से विनय का सामना, यह दृश्य कहानी में जितना महत्त्व रखता है उस हिसाब से इस दृश्य की लंबाई अन्यायपूर्ण है| अंत में ‘सम्यन्तक’ को केंद्र में रख कर लिखा गया सात पृष्ठों का उपसंहार जिसका कहानी से संबंध बहुत थोड़ा है, भी बहुत ज्यादा लंबा है|
लेखकीय पढ़ना हालाँकि आवश्यक नहीं, परन्तु कईं पाठक लेखक की सामान्य विचारधारा जानने या लेखक के बारे में जानने की उत्सुकता में लेखकीय पढ़ते हैं| ‘वन शॉट’ में श्री कँवल शर्मा जी ने कुल चौदह पृष्ठों का लेखकीय लिखा है, जिसमें उन्होंने भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी ‘रॉ' एवं उसके प्रसिद्ध जासूसों तथा उनके कारनामों के बारे में, और विश्वभर की विख्यात जासूसी संस्थाओं और उनके जासूसों के कारनामों के बारे में बताया है| यह जानकारी कितनी ही रोचक या रोमांचक हो, अगर पाठक इतने लंबे लेखकीय को छोड़ कर आगे बढ़ जाये तो ठीक, पढ़ने लग जाये तो पाठक के मन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है| मेरे मतानुसार किसी भी प्रकार के लेखकीय के लिए अधिकतम पांच पृष्ठ पर्याप्त हैं|

किसी भी उपन्यास में, दृश्य भले ही ज्यादा हों पर उन दृश्यों में संवाद कम या छोटे हों, तो कहानी की गति तेज हो जाती है और उपन्यास बड़ा होने पर भी पाठक को बोर नहीं करता| ऐसे दृश्य जिनका कहानी से कोई संबंध नहीं है और कहानी को मात्र रोमांचक या मनोरंजक बनाने के लिए डाले गए हों, या ऐसे दृश्य जिनका कहानी में संबंध बहुत थोड़ा हो, लंबे बिलकुल नहीं होने चाहिए| क्लाइमेक्स भी व्याख्यात्मक प्रकार के हो कर बहुत लंबे नहीं होने चाहिए|

श्री कँवल शर्मा जी के ‘वन शॉट' को मैं 6/10 अंक देता हूँ|
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समीक्षा
- संदीप नाईक

Tuesday, 13 February 2018

खोया- खोया चाँद- ओमप्रकाश राय यायावर

समीक्षा- "खोया खोया चाँद"

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आदरणीय मित्र ओम प्रकाश राय 'यायावर' सर्वप्रथम आपको इस कृति के लिए हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।
आप और आपका उपन्यास अनंत गगन की ऊंचाइयों तक पहुँचें।
हम कोई लेखक तो हैं नहीं और न ही हमारे पास शब्दों का है साथ ही साथ लेखन की कला कुशलता भी नहीं है फिर भी एक छोटी सी समीक्षा पाठक के हैसियत से लिख रहे हैं।
एक खास बात ये भी है दस घंटे अनवरत खोये हुए चाँद को हमने ढूंढा तब कहीं जाकर पचमढ़ी में मिला।
वैसे पूरी की पूरी कहानी भावनात्मक, प्रेम, विरह और प्रेरणादायक तथ्यों से होकर गुजरती है। कथा, कथानक और चरित्र सब का सब सर्वोत्तम है।

पाठक बन कर किसी कहानी को पढ़ने का अपना अलग ही मजा होता है, सभी दृश्यों में स्वयं खोजना , सबकुछ मानो जीवन्त हो रहा है,अपार हर्षोल्लास, कभी प्रेम तो कभी पीड़ा और मन में अनायास चंचलता बनी रहती है।

मैनें सही सुना था जो मजा बनारस में है वो कहीं भी नहीं है, इसका अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं-
दो गज जमीन होगी, एक खुला आसमान होगा।
साथ में आप होंगे और बी एच यू का दिलकश जहान होगा।।
-खोया खोया चाँद

इन पंक्तियों में बनारसीपन, चुहलबाजी, कुछ मटरगश्ती मालूम होती है।

छोटे छोटे अंश में बनारसीपने को जानते हैं -

सदफ और निहाल के इर्द गिर्द कहानी परिक्रमा करती हुई नज़र आयेगी। जहाँ सदफ बहुत ही चंचल, समझदार और मुंहफट मुस्लिम समुदाय की लड़की है वहीं निहाल भोला, बुद्धिमान और ध्यान रखने वाले व्यक्तित्व का व्यक्ति हिन्दू समुदाय से है।

निहाल पी सी एस की तैयारी इलाहाबाद से छोड़ कर बनारस बी एड करने आते हैं और कहते हैं -

ग्रैजुऐशन करने बाद बी एड करना उतना ही जरूरी होता है जितना कि मरने के बाद तेरहीं।
-खोया खोया चाँद

यहां सदफ से उनकी मुलाकात, बात और चुहलबाजी के साथ प्यार भी हो जाता है।
खैर लेखक ने बनारस के प्रसिद्ध दार्शनिक स्थलों का बखूबी वर्णन किया है जैसे अस्सी घाट, गंगा , काशी विश्वनाथ मंदिर इत्यादि, सब कुछ हम ही बता देंगे तो आप उपन्यास पढ़ेंगे ही नहीं।

कवि और लेखक में अन्तर जानना और पहचानना हो तो यायावर जी के द्वारा सदफ का सौन्दर्य वर्णन देखिए।

''हर सवाल का जवाब सवाल नहीं होता,
आसमां काहर चमकता सितारा बेमिसाल नहीं होता।
ये सच है कि मौन सर्वोत्तम भाषण है,
पर हर बार चुप रहना मिसाल नहीं होता।।"

-खोया खोया चाँद

थोड़ी सी बात और उपन्यास पढ़ने के पश्चात मेरा व्यक्तिगत अनुभव कहानी के शुरुआत में बी एच यू कैंपस और छात्रावास में निहाल समेत उनके साथियों की चुहलबाजी, चाय की चुस्कियाँ और मेस पर खाने के चक्कर में लफ्फाजी लाजवाब लगी परन्तु गालियों को शामिल करना मुझे अजीब लगा मतलब बिल्कुल भी पसंद नहीं आया।
सदफ के साथ निहाल के बिताए हुए पलों का भाव पक्ष की दृष्टि से अद्वितीय अद्भुत वर्णन इसके लिए आपको साधुवाद।
अन्तिम बात पूरे उपन्यास की सबसे महत्वपूर्ण पहलू और मेरे दृष्टिकोण से सबसे अहम बात मुहब्बत को जिस्मानी संबंधों बिल्कुल परे एहसासों से जोड़ना बहुत ही खूबसूरत और दिल से अच्छा लगा और मेरे समझ जो निहाल ने किया वो सच्ची मुहब्बत है।

उपन्यास पढ़ते पढ़ते मुझे  जाने कितनी बार रोना 😢 आया, यदि इस कहानी के किरदार वास्तविकता में हैं तो मैं सदफ और निहाल से मिलना चाहूँगी। मेरे मन इन दोनों को लेकर न जाने क्या क्या चल रहा है! मेरे प्रश्नों के उत्तर लेखक के अलावा निहाल व सदफ ही दे सकते हैं।

परम मित्र ओम प्रकाश राय 'यायावर' को ' खोया खोया चाँद ' के लिए हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।
हम आशा करते हैं आप इसी प्रकार अन्य कहानियों को हम पाठकों तक पहुंचा कर हमें अभिभूत करते रहेंगे।

- समीक्षा
अंशिका शर्मा
11/02/2018