Thursday, 5 April 2018

मास्टरमाइंड - शुभानंद

मास्टमाइंड - शुभानन्द

अभी अभी मास्टरमाइंड पढकर खत्म की है... बहुत ही रोमांचक उपन्यास है.  शुभानन्द सर की कलम से निकली कहानी कहीं भी बोर नहीं करती और एक बार पढना शुरू करने के बाद पूरा करके ही उठने को मन करता है.

जावेद-अमर-जॉन की जोड़ी खूब जंची है. रिंकी भी इनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती दिखी. रिंकी की अमर के साथ दुकड़ी देखकर मुझे लग रहा रहा था कि इसे  J A J R सिरीज में लिखने की योजना होगी.

        मास्टरमाइंड का रहस्य अंत तक बना रहा. कहानी बीच बीच में कई मोड़ लेती हुई  मास्टरमाइंड का इशारा दूसरी तरफ कर देती थी और अंत में भी यही लगा था कि  मास्टरमाइंड कोई और है और कहानी का असली मास्टरमाइंड उसका मोहरा मात्र है. कहानी वाकई में रहस्य की परतों से लबरेज है जिसे  जावेद-अमर-जॉन के साथ  रिंकी की चौकड़ी मिलकर उधेड़ डालती है. जावेद जैसा खुर्राट जासूस भी जिके प्लान में फंस जाए वह वाकई में जबरदस्त गेमर होगा...

मेरा तो एक ही मशवरा है कि जिसने भी इसे नहीं पढा है वह एक बार इसे पढे जरूर...

समीक्षक-
सतवीर वर्मा 'बिरकाळी'- No. 9112003232
हनुमानगढ़, राजस्थान

Wednesday, 14 March 2018

एक्सीडेंट:- एक रहस्य कथा

एक्सीडेंट : एक रहस्य कथा- अनुराग कुमार ‘जीनियस’

श्री अनुराग कुमार जी लिखित ‘एक्सीडेंट : एक रहस्य कथा’ सूरज पॉकेट बुक्स, ठाणे (महाराष्ट्र) द्वारा प्रकाशित है।

सूरज पॉकेट बुक्स से श्री अनुराग कुमार जी का यह प्रथम उपन्यास है और मैंने भी श्री अनुराग कुमार जी को पहली बार इसी उपन्यास में पढ़ा है। इसके पूर्व श्री अनुराग कुमार जी का ‘एक लाश का चक्कर’ तुलसी पेपर बुक्स, मेरठ से प्रकाशित हो चुका है, वह मैंने नहीं पढ़ा है।

लेखक की कथाकथन शैली मुझे अच्छी लगी, न तो बहुत जटिल वाक्य हैं और न ही अनावश्यक रूप से डाले गए कठिन शब्द। भाषा सरल एवं बोधगम्य है। भाषा के सरल एवं बोधगम्य होने से पाठक का ध्यान जटिल वाक्यों और कठिन शब्दों को समझने में न भटक कर सिर्फ और सिर्फ कहानी पर रहता है।

उल्लेखनीय ये, कि लेखक महोदय ने दृश्यों का वर्णन जिस तरह से कलात्मक परंतु सरल भाषा में किया है, वह दृश्यों में अतिरिक्त रोमांच पैदा कर देता है। जैसे, “कार की हेडलाइट्स की रौशनी से डर कर कुछ देर के लिए अंधेरे ने अपने पांव कुछ समेट लिए..” और “...सड़क पर लहराई कार पुल की रेलिंग तोड़ कर अंधेरे में एनाकोंडा नज़र आ रही नदी में जा समाई।”, इस तरह के प्रयोग अतिरिक्त रोमांच पैदा कर देते हैं।

कहानी अच्छी है, कहानी के बुनने में किसी प्रकार की जटिलता नहीं रखी गई है। साथ ही पात्र भी सीमित हैं, अनेक अनावश्यक पात्र प्रस्तुत कर पाठक को भरमाने का प्रयास भी नहीं किया गया है। बस अघोरानाथ, नागेश और उर्वशी वाले दृश्य मुझे अनावश्यक लगे, क्योंकि कहानी की मुख्यधारा में इनका या इनके साथ घाटी घटनाओं का कोई विशेष महत्व नहीं था।

तो, कहानी ऐसी है कि, सेठ भानुप्रताप जो कि दो एक्सपोर्ट मिलों के मालिक हैं, को घर आए इंस्पेक्टर दुर्गेश से सूचना मिलती है कि उनके छोटे बेटे ऋषभ की एक कार एक्सीडेंट में मृत्यु हो गई है। घर में उस समय स्वयं सेठ भानुप्रताप, उनका बड़ा बेटा आलोक और आलोक की पत्नी लाली होते हैं। इंस्पेक्टर दुर्गेश द्वारा जो लाश दिखाई जाती है, वह पहचानने लायक न होने पर भी लाश के साथ मिली वस्तुओं के आधार पर परिवारजनों को यह विश्वास करना पड़ता है कि वह लाश उनके ऋषभ की ही है, और परिवारजन उस लाश का अंतिम संस्कार कर देते हैं।
लेकिन ऋषभ तो स्वयं घर आ पहुंचता है, और सभी लोग स्तब्ध रह जाते हैं। दिल्ली से लौटा ऋषभ अपने साथ हुई चोरी की घटना के बारे में बताता है, कि किसी चोर ने उसके सिर पर डंडा मार कर उसे बेहोश कर दिया था और होश में आने पर उसने पाया कि उसका बैग, घड़ी, सोने की चैन व अंगूठी और बनियान व अंडरवियर छोड़ कर बाकी कपड़े तक गायब थे। फिर ऋषभ आगे बताता है कि, एक दोस्त जिसकी शादी में सम्मिलित होने वह दिल्ली गया था, उस दोस्त की मदद से वह बाद में ट्रेन से राजनगर वापस आया है। इससे सबको यही लगता है कि वह लाश उस चोर की थी जो ऋषभ का सामान ले कर भागा था, जिसका एक्सीडेंट हो गया।
परंतु कुछ ही दिनों में ऋषभ की हरकतों से परिवारजनों की खुशी हवा हो जाती है, क्योंकि ऋषभ की अजीबोगरीब हरकतों से घर में सबको यह लगने लगता है कि यह ऋषभ न होकर उसकी जगह आया कोई बहरूपिया है, जिसे किसी विशेष उद्देश्य के साथ उनके घर भेजा गया है। सवाल ये भी उठता है कि क्या किसी दुश्मन ने ऋषभ के बहरूपिये को किसी उद्देश्य के साथ उनके घर में भेजा है?
सेठ भानुप्रताप का बड़ा बेटा आलोक उसी इंस्पेक्टर दुर्गेश की मदद लेने की सोचता है जो ऋषभ की मृत्यु की सूचना ले कर आया था। आलोक की पत्नी लाली पर फ़िदा हुआ इंस्पेक्टर दुर्गेश लाली के करीब आने के लालच में आलोक की बात मान कर मामले की जांच करना स्वीकार कर लेता है।
और यहीं से कईं रोमांचक व हतप्रभ कर देने वाली रहस्यमयी घटनाओं का सिलसिला शुरू हो जाता है। और अंत में एक एक कर सभी रहस्य उजागर होते चले जाते हैं।

श्री अनुराग कुमार जी अपने लेखकीय में कहानी के बारे में दावा करते हैं कि कहानी में जो राज छुपा हुआ है वो अंत से पहले नहीं खुलेगा, और ये चैलेंज है पाठकों के लिए।
तो अनुराग जी, ऐसा है कि पाठकों को चैलेंज उन रहस्य कथाओं में दिया जाना ठीक है जिनमें राज के बारे में कुछ क्लू (संकेत) भी लेखक द्वारा दिये जाते हों। पर आपके उपन्यास का क्लाइमेक्स (चरम) तो हैट में से खरगोश निकाल कर दिखाने जैसा था, जिसमें पाठकों को अपना दिमाग लड़ाने के लिए कोई अवसर ही नहीं था। अंत में पात्रों के बीच वार्तालाप के माध्यम से अचानक रहस्य को उजागर कर दिया गया, इसमें क्लू वाली तो कोई बात ही नहीं थी।
मान लीजिए आपकी कहानी के दो भाग हैं, A व B। यहां B वह भाग है जिसमें पात्रों के आपसी वार्तालाप के माध्यम से रहस्योद्घाटन होकर कहानी का अंत होता है, और A वह भाग है जिसमें आरम्भ से कहानी घटित होती है। आपका B भाग ऐसा है कि यदि इसे पूरा बदल भी दिया जाए तो भी A भाग में किसी प्रकार के संशोधन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
कहने का तात्पर्य ये, कि A भाग में B भाग के बारे में कोई संकेत नहीं हैं। A भाग के समाप्त होते ही B भाग को कहीं भी मोड़ा जा सकता था।
कहानी आरम्भ से ऐसे बुनी हुई होनी चाहिए जिसमें एक ही अंत संभव हो। ऐसा होने पर पाठक को यह परम संतुष्टिदायक लगता है कि इससे अच्छा अंत हो ही नहीं सकता था।

वैसे कहानी में गति अच्छी है, न बहुत तेज न बहुत धीमी। लेखक ने पात्रों के संवाद बोलते समय की भाव-भंगिमाओं और हरकतों का जिस तरह से वर्णन किया है उससे दृश्य अधिक मनोरंजक बन पड़े हैं। संवाद बहुत कलात्मक नहीं हैं, पर कहानी के अनुरूप ही हैं।

आगामी उपन्यासों के लिए श्री अनुराग कुमार जी को अनेकानेक शुभकामनाएं।

मैं ‘एक्सीडेंट : एक रहस्य कथा’ को 6.5/10 अंक देता हूँ।

- समीक्षक
   संदीप नाईक
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एक्सीडेंट:- एक रहस्य कथा

Friday, 9 March 2018

वन शाॅट- कंवल शर्मा

श्री कँवल शर्मा जी लिखित “वन शॉट” रवि पॉकेट बुक्स, मेरठ द्वारा प्रकाशित है|

श्री कँवल शर्मा जी को पहली बार मैंने “वन शॉट” में ही पढ़ा है| उपन्यास का शीर्षक अंग्रेजी में है और शैली भी विदेशी अंग्रेजी उपन्यासों जैसी है| “वन शॉट” पढ़ते-पढ़ते मुझे “श्री ली चाइल्ड जी लिखित जैक रीचर श्रृंखला के प्रथम उपन्यास ‘किलिंग फ्लोर” का स्मरण हो आया|

वैसे कहा जा सकता है की श्री कँवल शर्मा जी की शैली अंतर्राष्ट्रीय स्तर की है, यदि इनके उपन्यास अंग्रेजी में अनुवादित किये जाएँ तो विदेशों में भी पसंद किये जा सकते हैं|

श्री कँवल शर्मा जी की कथाकथन शैली रोचक है और उपन्यास मुझे पसंद भी आया| जैसा की मैं हमेशा कहता हूँ, लेखक की कथाकथन शैली यदि सजीव हो तो पढ़ने में आनंद आता है, वर्ना नहीं| लेखक उचित शब्दों व वाक्यों के मध्यम से यदि अपनी कल्पनाएं पाठक के मस्तिष्क में साकार न कर पाए तो कहानी अच्छी होने के बाद भी पाठक उसका आनंद नहीं ले पाता| लेखक वही सफल होता है जो अपने पाठकों को वैसा महसूस करवा दे जैसा वह चाहता है, तभी उसका लेखन सार्थक होता है|
“सर्द दिसंबर की उस घने कोहरे वाली गहरी स्याह रात में एक काली वैन तेजी से उस हाईवे पर दौड़ी जा रही थी…” इन पंक्तियों के साथ श्री कँवल शर्मा जी के “वन शॉट” का आरम्भ होता है, और इन्हीं पंक्तियों को पढ़ते ही पाठक के मस्तिष्क में चित्र उभरते चले जाते हैं| लेखक महोदय कहानी के हर तत्व का भास करवाने में सफल रहे जैसा की वे चाहते थे| कहानी एक मर्डर मिस्ट्री है, जिसमें रहस्य व रोमांच के तत्वों का उचित समावेश है|

विनय रात्रा एक जांबाज रॉ एजेंट है और जॉर्जिया की राजधानी तिब्लिसी में अपने किसी अभियान पर है, उसे सूचना मिलती है की उसके सगे भाई रोहन रात्रा की मृत्यु हो गयी है| सूचना मिलते ही विनय तिब्लिसी से भारत आने के लिए निकल पड़ता है और पहले दिल्ली अपने मुख्यालय और फिर तुरंत राजनगर पहुँचता है, क्योंकि रोहन राजनगर में रह रहा था| राजनगर आते ही विनय का स्वागत ‘वन शॉट’ से होता है जिसमें वह बच जाता है|
राजनगर आकर विनय को पता चलता है की उसके भाई रोहन की मृत्यु संदिग्ध परिस्थितियों में संभवतया ‘वन शॉट’ से हुई है, जिसके आत्महत्या न होकर हत्या होने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता| विनय स्वयं ही अपने भाई की मृत्यु के कारणों का, एवं उसके हत्यारों का पता लगा कर उसके हत्यारों को सजा देने की ठान लेता है| रोहन की मृत्यु के सही कारणों का पता लगा कर दोषियों को पकड़ने में राजनगर पुलिस प्रशासन का रवैया सुस्त व असहयोगात्मक होता है, साथ ही राजनगर के रसूखदार व ऊँचे ओहदों पर बैठे लोग विनय की राह में बाधक बनते हैं| पर विनय को अपने विभाग के सहकर्मियों से ‘अन-ऑफिशियल’ सक्रीय सहयोग प्राप्त होता है|

कहानी तो तेज गति से आगे बढ़ने लायक है परंतु अनुचित रूप से लंबे संवादों ने गति को बहुत धीमा किया है| विनय द्वारा पूछताछ करने के दृश्यों में संवाद बहुत ज्यादा लंबे हैं| उदाहरणार्थ, रोहन की प्रेमिका सह्याद्री से और चपरासी उजागर से विनय द्वारा पूछताछ करने के दृश्यों में संवाद अनुचित रूप से लंबे हैं| उपन्यास के आरंभ में विनय और उसके सहकर्मी/मित्र नूर अलदीन से विनय का सामना, यह दृश्य कहानी में जितना महत्त्व रखता है उस हिसाब से इस दृश्य की लंबाई अन्यायपूर्ण है| अंत में ‘सम्यन्तक’ को केंद्र में रख कर लिखा गया सात पृष्ठों का उपसंहार जिसका कहानी से संबंध बहुत थोड़ा है, भी बहुत ज्यादा लंबा है|
लेखकीय पढ़ना हालाँकि आवश्यक नहीं, परन्तु कईं पाठक लेखक की सामान्य विचारधारा जानने या लेखक के बारे में जानने की उत्सुकता में लेखकीय पढ़ते हैं| ‘वन शॉट’ में श्री कँवल शर्मा जी ने कुल चौदह पृष्ठों का लेखकीय लिखा है, जिसमें उन्होंने भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी ‘रॉ' एवं उसके प्रसिद्ध जासूसों तथा उनके कारनामों के बारे में, और विश्वभर की विख्यात जासूसी संस्थाओं और उनके जासूसों के कारनामों के बारे में बताया है| यह जानकारी कितनी ही रोचक या रोमांचक हो, अगर पाठक इतने लंबे लेखकीय को छोड़ कर आगे बढ़ जाये तो ठीक, पढ़ने लग जाये तो पाठक के मन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है| मेरे मतानुसार किसी भी प्रकार के लेखकीय के लिए अधिकतम पांच पृष्ठ पर्याप्त हैं|

किसी भी उपन्यास में, दृश्य भले ही ज्यादा हों पर उन दृश्यों में संवाद कम या छोटे हों, तो कहानी की गति तेज हो जाती है और उपन्यास बड़ा होने पर भी पाठक को बोर नहीं करता| ऐसे दृश्य जिनका कहानी से कोई संबंध नहीं है और कहानी को मात्र रोमांचक या मनोरंजक बनाने के लिए डाले गए हों, या ऐसे दृश्य जिनका कहानी में संबंध बहुत थोड़ा हो, लंबे बिलकुल नहीं होने चाहिए| क्लाइमेक्स भी व्याख्यात्मक प्रकार के हो कर बहुत लंबे नहीं होने चाहिए|

श्री कँवल शर्मा जी के ‘वन शॉट' को मैं 6/10 अंक देता हूँ|
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समीक्षा
- संदीप नाईक

Tuesday, 13 February 2018

खोया- खोया चाँद- ओमप्रकाश राय यायावर

समीक्षा- "खोया खोया चाँद"

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आदरणीय मित्र ओम प्रकाश राय 'यायावर' सर्वप्रथम आपको इस कृति के लिए हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।
आप और आपका उपन्यास अनंत गगन की ऊंचाइयों तक पहुँचें।
हम कोई लेखक तो हैं नहीं और न ही हमारे पास शब्दों का है साथ ही साथ लेखन की कला कुशलता भी नहीं है फिर भी एक छोटी सी समीक्षा पाठक के हैसियत से लिख रहे हैं।
एक खास बात ये भी है दस घंटे अनवरत खोये हुए चाँद को हमने ढूंढा तब कहीं जाकर पचमढ़ी में मिला।
वैसे पूरी की पूरी कहानी भावनात्मक, प्रेम, विरह और प्रेरणादायक तथ्यों से होकर गुजरती है। कथा, कथानक और चरित्र सब का सब सर्वोत्तम है।

पाठक बन कर किसी कहानी को पढ़ने का अपना अलग ही मजा होता है, सभी दृश्यों में स्वयं खोजना , सबकुछ मानो जीवन्त हो रहा है,अपार हर्षोल्लास, कभी प्रेम तो कभी पीड़ा और मन में अनायास चंचलता बनी रहती है।

मैनें सही सुना था जो मजा बनारस में है वो कहीं भी नहीं है, इसका अंदाजा आप इससे लगा सकते हैं-
दो गज जमीन होगी, एक खुला आसमान होगा।
साथ में आप होंगे और बी एच यू का दिलकश जहान होगा।।
-खोया खोया चाँद

इन पंक्तियों में बनारसीपन, चुहलबाजी, कुछ मटरगश्ती मालूम होती है।

छोटे छोटे अंश में बनारसीपने को जानते हैं -

सदफ और निहाल के इर्द गिर्द कहानी परिक्रमा करती हुई नज़र आयेगी। जहाँ सदफ बहुत ही चंचल, समझदार और मुंहफट मुस्लिम समुदाय की लड़की है वहीं निहाल भोला, बुद्धिमान और ध्यान रखने वाले व्यक्तित्व का व्यक्ति हिन्दू समुदाय से है।

निहाल पी सी एस की तैयारी इलाहाबाद से छोड़ कर बनारस बी एड करने आते हैं और कहते हैं -

ग्रैजुऐशन करने बाद बी एड करना उतना ही जरूरी होता है जितना कि मरने के बाद तेरहीं।
-खोया खोया चाँद

यहां सदफ से उनकी मुलाकात, बात और चुहलबाजी के साथ प्यार भी हो जाता है।
खैर लेखक ने बनारस के प्रसिद्ध दार्शनिक स्थलों का बखूबी वर्णन किया है जैसे अस्सी घाट, गंगा , काशी विश्वनाथ मंदिर इत्यादि, सब कुछ हम ही बता देंगे तो आप उपन्यास पढ़ेंगे ही नहीं।

कवि और लेखक में अन्तर जानना और पहचानना हो तो यायावर जी के द्वारा सदफ का सौन्दर्य वर्णन देखिए।

''हर सवाल का जवाब सवाल नहीं होता,
आसमां काहर चमकता सितारा बेमिसाल नहीं होता।
ये सच है कि मौन सर्वोत्तम भाषण है,
पर हर बार चुप रहना मिसाल नहीं होता।।"

-खोया खोया चाँद

थोड़ी सी बात और उपन्यास पढ़ने के पश्चात मेरा व्यक्तिगत अनुभव कहानी के शुरुआत में बी एच यू कैंपस और छात्रावास में निहाल समेत उनके साथियों की चुहलबाजी, चाय की चुस्कियाँ और मेस पर खाने के चक्कर में लफ्फाजी लाजवाब लगी परन्तु गालियों को शामिल करना मुझे अजीब लगा मतलब बिल्कुल भी पसंद नहीं आया।
सदफ के साथ निहाल के बिताए हुए पलों का भाव पक्ष की दृष्टि से अद्वितीय अद्भुत वर्णन इसके लिए आपको साधुवाद।
अन्तिम बात पूरे उपन्यास की सबसे महत्वपूर्ण पहलू और मेरे दृष्टिकोण से सबसे अहम बात मुहब्बत को जिस्मानी संबंधों बिल्कुल परे एहसासों से जोड़ना बहुत ही खूबसूरत और दिल से अच्छा लगा और मेरे समझ जो निहाल ने किया वो सच्ची मुहब्बत है।

उपन्यास पढ़ते पढ़ते मुझे  जाने कितनी बार रोना 😢 आया, यदि इस कहानी के किरदार वास्तविकता में हैं तो मैं सदफ और निहाल से मिलना चाहूँगी। मेरे मन इन दोनों को लेकर न जाने क्या क्या चल रहा है! मेरे प्रश्नों के उत्तर लेखक के अलावा निहाल व सदफ ही दे सकते हैं।

परम मित्र ओम प्रकाश राय 'यायावर' को ' खोया खोया चाँद ' के लिए हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।
हम आशा करते हैं आप इसी प्रकार अन्य कहानियों को हम पाठकों तक पहुंचा कर हमें अभिभूत करते रहेंगे।

- समीक्षा
अंशिका शर्मा
11/02/2018

Wednesday, 17 January 2018

वीर की विजय यात्रा- दिनेश चारण

वीर की विजय यात्रा- दिनेश चारण

फैंटेसी, हिस्टोरिकल फिक्शन ने प्रगति करते करते इतनी तरक्की कर ली है कि कहीं न कहीं साहित्य की मुख्य धारा को रिप्लेस ही कर दिया है।नए नए लेखक जुड़ते जाते हैं और नए नए कीर्तिमान गढ़ते जाते हैं।इन्हीं लोगों में से अपने पहले उपन्यास के साथ दस्तक दी है नए नवेले लेखक दिनेश चारण ने।लेखक को उनकी उपलब्धियों के लिए बधाई।
      
कथानक-कथानक सरल है और रोचक है।पाठक को बाँधे रखने में सक्षम है।लेखक ने काल्पनिक स्थान,पात्रों के साथ कहानी का अच्छा तानाबाना बुना है।130 पेज में फैले इस कथानक में एक और विशेषता है वह यह कि ये बच्चों के साथ साथ बड़ों के पढ़ने के लिए भी है।परंतु इस उपन्यास में बड़ों वाली पठनीयता बहुत पीछे छूट जाती है और आज के परिपेक्ष्य में कथानक के स्तर का विश्लेषण करने के बाद यह बच्चों वाली ही पुस्तक प्रतीत होती है।बच्चों के लिए यह जितनी रोचक हो सकती है उतना बड़ों के लिए नहीं।

भाषा-भाषाई तौर पर भी लेखक उन्नीस नजर आते हैं।कहानी के काल,क्रम आदि को देखते हुए भाषा-शैली पूर्णतया सटीक नहीं कही जा सकती।लेखक कठिन शब्दों से बचे हैं और समझ में आने योग्य लिखने का यथासंभव प्रयास किया है।यह एक अच्छी बात है।

पात्र-पात्रों की भरमार नहीं है एवं सभी पात्रों के साथ पूरा पूरा न्याय हुआ है।वीरसेन जो कि कहानी का मुख्य नायक है वह पूरे उपन्यास में छाया हुआ है।एक अच्छे मित्र की तरह राजकुमार प्रद्युम्न में उसका बखूबी साथ निभाया है।इसके अतिरिक्त बिलाल खान,कासम खान आदि भी मुख्य पात्र हैं जिन्होंने कहानी का भार उठाया है।सहायक पत्रों की भी अच्छी भूमिका है।

संपादकीय पक्ष-इस उपन्यास की सबसे बड़ी कमजोरी इसका संपादकीय पक्ष ही है।पूरे उपन्यास में गिने चुने पृष्ठों को छोड़ दें तो हर पृष्ठ में वर्तनी,विराम चिह्न आदि में ढेरों गलतियाँ हैं।सूरज पॉकेट बुक्स जैसे तेजी से उभर रहे प्रकाशन संस्थान को अपना संपादकीय पक्ष काफी मजबूत करने की आवश्यकता है।

अन्य-पृष्ठ 48 और 49 को ध्यान से पढ़ा जाय तो कहीं भी दोनों गुप्तचरों को शंकर अपना नाम नहीं बताता और यह उन सबों की पहली मुलाकात भी है जहाँ दोनों गुप्तर शंकर से अपरिचित होते हैं  एवं शंकर उन दोनों से।परंतु फिर भी एक बार गुप्तचर शंकर को उसके नाम से बुलाते हैं।इसके अतिरिक्त ध्यान देने वाली बात यह भी है कि दो जगहों पर लेखक ने आजकल प्रचलित बिहारी भाषा का प्रयोग किया है जबकि उस समय इस भाषा का विकास संभवतः नहीं हुआ था।

निष्कर्ष यह कि इस उपन्यास को एक बार पढ़कर देखा जा सकता है।आप निराश नहीं होंगे।संपादक पक्ष मजबूत किया जा सकता था था।साथ ही कथानक को 10-15 पेज कम भी किया जा सकता था।उसमें कहानी ज्यादा कसी हुई लगती।लेखक की शुरुआती रचना है,यह बात मुखरित होती रहती है।कुछ बिंदुओं पर लेखक को परिपक्व होने की आवश्यकता है।लेखक से उम्मीदें बहुत हैं।हाँ कवर काफी उम्दा बन पड़ा है उसके लिए पूरी टीम बधाई के पात्र हैं।पेज की क्वालिटी भी बहुत अच्छी है।इसको देखते हुए मूल्य वाजिब कहा जा सकता है।उम्मीद है इसके अगले प्रकाशन में संपादक वर्तनी आदि को कम करने का प्रयास करेंगे।लेखक को अपने अगले किताब के लिए शुभकामनाएं।।

समीक्षा
अभिषेक कुमार

Sunday, 14 January 2018

आहुति- कुशवाहा कांत

आहुति- कुशवाहा कांत
 
सामाजिक उपन्यासकार कुशवाहा कांत का उपन्यास आहुति सम्राट अशोक के जीवन का एक काल्पनिक पक्ष हमारे सामने प्रस्तुत करता है।
   सम्राट अशोक वृद्धावस्था में अपनी श्रेष्ठ परिचारिका से शादी कर लेते हैं। जवान परिचारिका और वृद्ध राजा का मिलन तन का ही होता है मन का नहीं।
    सम्राट अशोक के अस्वस्थ होने पर सारा शासन कार्य परिचारिका के हाथ में आने पर वह अपनी कुटिल प्रवृति जाहिर कर देती है और जिसकी सजा अशोक के पुत्र कुणाल को भुगतनी पङती है।
  कुणाल की श्रत्राणी पत्नी कांचन इस षडयंत्र का पता चलाकर विद्रोह करती है और अंत में अन्याय का पर्दाफाश करती है।

यह उपन्यास बहुत ही रोचक है। पाठक एक बार आरम्भ करने पर समापन करके ही उठता है। इसकी कहानी काल्पनिक होकर भी सत्य के नजदीक है।

उपन्यास- आहुति
लेखक- कुशवाहा कांत

लेखक की अन्य जानकारी यहाँ उपलब्ध है-
http://sahityadesh.blogspot.in/search/label/कुशवाहा%20कांत?m=0

Thursday, 11 January 2018

तुरूप का इक्का- गजाला

जासूस गजाला प्रियदर्शी का कारनामा।
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    गजाला जी का उपन्यास तुरूप का इक्का पढने को मिला, यह उपन्यास एक एक्शन उपन्यास है। एक्शन उपन्यास पढने वालों को काफी पसंद आयेगा।
यह गजाला जी का पहला उपन्यास है
    
   उपन्यास की कहानी की बात करें तो यह कहानी इजराइल और फिलिस्तीन के मध्य चल रहे संघर्ष पर आधारित है। जहाँ दोनों देश एक- दूसरे पर अपनी विजय दर्शाने के लिए संघर्ष करते हैं तो वहीं कुछ निर्दोष इस संघर्ष की बलि चढ जाते हैं।
   ऐसे ही एक निर्दोष को बचाने के लिए गजाला प्रियदर्शी पहुंच जाती है इजराइल। लेकिन वहाँ फंस जाती है सत्य और असत्य के बीच।
   
जासूस गजाला प्रियदर्शी फिलिस्तीन देश में एक लङके को बचाने के लिए जाती है पर वहाँ जाकर खुद फंस जाती है और वहाँ एक छोटी सी बच्ची अदिया भी मिलती जिसे बचाने के लिए गजाला दुश्मनों से भीङ जाती है और अंत में दुश्मनों को खत्म कर जीत जाती है।

पूरे उपन्यास में एक्शन दृश्यों की भरमार है, कई- कई जगह तो मारधाङ तीन- चार पृष्ठ तक लगातार चलती है। तीन सौ पृष्ठों के उपन्यास में से लगभग सौ पृष्ठ तो एक्शन से भरे हुये हैं।

   लेखिका के प्रथन उपन्यास को पढकर जहां उनकी प्रतिभा का पता चलता है वहीं कहानी के स्तर पर उपन्यास मध्यम स्तर तक भी बहुत कठिनता से पहुंचता है। उपन्यास को आवश्यकता से अधिक विस्तार देकर कहानी को और भी कमजोर कर दिया।
    हर पांच- दस पृष्ठ कर पश्चात पाठक को वही मारपीट वाले दृश्य पढने को मिलते हैं।
   उपन्यास बहुत ही अच्छा है, अच्छा उपन्यास पाठक को पसंद आयेगा। इसकी कहानी दो देशो पर आधारित है जो पढने वाले को अच्छी लगेगी।

प्रकाशक- रवि पॉकेट बुक्स- मेरठ