लेखक- Lebals
- अजय सिंह
- अनिल मोहन
- अनुराग कुमार जीनियस
- आनंद कुमार सिंह
- एम. इकराम फरीदी
- ओमप्रकाश राय यायावर
- कंवल शर्मा
- कुशवाहा कांत
- गजाला
- जनप्रिय लेखक ओमप्रकाश शर्मा
- दिनेश चारण
- देवेंन पांडेय
- बाल उपन्यास
- मनीष खण्डेलवाल
- मोहन मौर्य
- रमाकान्त मिश्र
- वेदप्रकाश कांबोज
- शुभानंद
- सत्य व्यास
- संदीप नायर
- सबा खान
- सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर'
- सुरेन्द्र मोहन पाठक
Tuesday, 12 March 2019
एक करोड़ का जूता- सुरेन्द्र मोहन पाठक
Monday, 4 March 2019
हिरोइन की हत्या- आनंद कुमार सिंह
सम प्रीत- एम. इकराम फरीदी
Sunday, 24 February 2019
आॅप्रेशन AAA- मोहन मौर्य
आॅप्रेशन- AAA- मोहन मौर्य
समीक्षक- संजीव शर्मा
साहब जी,
किताब पढ़ कर खत्म की
सॉरी लेकिन बिल्कुल पसंद नही आई
किताब का शीर्षक attractive है पर कहानी को सूट नही करता है
कहानी 1970 - 80 की फिल्मों की कहानी जैसी लगी
जो अच्छी तो है पर फ्री में पढ़ने को मिले तो ठीक पर 120 रुपये खर्च करने लायक नही
175 पेज की किताब ऊपर से पार्ट में मतलब एक तो करेला ऊपर से नीम चढ़ा एक ही पार्ट 300 या 350 पेज का होता तो ठीक था
दूसरे पार्ट के लिए फिर 120 रुपये खर्च करने से पहले दस बार सोचना पड़ेगा
तीन छोटी छोटी कहानी को लिख कर नॉवेल लिखी
कहानी भी ऐसी जिनमे कुछ खास दम नही थ्रिल नही ट्विस्ट नही
कहानी में आगे क्या होगा वो पहले से पता चल जाये खास कर उन पाठकों को जो 20 से 30 बरस से अनिल मोहन वेद प्रकाश शर्मा कंबोज जी , सुरेंद्र मोहन पाठक जी को पढ़ रहे हैं
मोहन जी
कहानी लिखने से पहले कहानी के करैक्टर को स्ट्रांग बनाये
जो किताब पढ़ने के बाद भी याद रहे जैसे सुनील, विमल विजय विकास, देवराज चौहान
आपकी कहानी भले ही अच्छी हो दमदार नही है
कहानी कहने का अंदाजे बयां बडा कमजोर है
सीधी साधी कहानी से नही नावेल नही बनती नॉवेलअपने ट्विस्ट थ्रिल सस्पेन्स से दमदार बनती है
पहले पेज से पाठक किताब से जुड़ जाना चाहिए उसके पात्रों से जुड़ना चाहिए
पर ऑप्प्रेशन a a a बड़ी कमजोर और पुराने जमाने की कहानी लगी
जिसके लिए 120 रुपये खर्चना महंगा काम है
5 में से सिर्फ 2 स्टार आपकी मेहनत लगन के लिए।
Thursday, 7 February 2019
दांव खेल, पासे पलट गये- वेदप्रकाश कांबोज
दाव खेल, पासे पलट गये- वेदप्रकाश कांबोज
समीक्षा- शिखा अग्रवाल
सबसे पहले बात लेखकीय की तो लेखकिय पहले प्रकाशित उपन्यास प्रेतों के निर्माता की तरह ही बेहतरीन है,उपन्यास के4 मुख्य पात्र है-विजय,फन्ने खा तातारी,कुंदन कबाड़ी और हुचांग,कहानी भारत और रूस के बीच होने वाले गुप्त समझौते से होती है जिसे रोकने और मालूम करने के लिए चीनी अपने जासूस हुचांग को मिशन पर भेजते है,भारत की तरफ से दस्तावेज लाने की जिम्मेदारी विजय को दी जाती है जो भारतीय सीक्रेट सर्विस का महत्वपूर्ण सदस्य है,इस मिशन में विजय का साथ कुंदन कबाड़ी और फन्ने खा तातारी देते है जो सी.आई.डी. में ट्रेनी है,विजय और हुचांग की एक मुलाकात पहले भी हुई होती है जिसमे हुचांग जुए में उसे चालाकी से हराता है,तब विजय उससे कहता है कि मेज के जुए में और जिंदगी के जुए में बहुत फर्क होता है!पूरे नोवल में शुरू से अंत तक दाव खेल चलते रहते है और अंत तो जबरदस्त है ही जब पासे पलटते है,तातारी और कबाड़ी की झकझकिया हँसा हँसा कर पागल कर देती है,कही ना कहीं इन दोनों का किरदार मुझे विजय पे भी भारी पड़ता हुआ लगा,अंत बहुत ही चौकाने वाला है,पूरा नॉवल एक ही बैठक में पठनीय है!पिछले नॉवेल में प्रूफ रीडिंग की जो गलतियां सामने आई थी वो इस नॉवेल में पूरी तरह दुरुस्त कर दी गयी है!आगे भी सर के ऐसे ही बेहतरीन नगीने हमे पड़ने को मिलते रहेंगे यही आशा है.
अंत तातारी की एक झकझकी से करना चाहूंगी-
मेरी ऐसी हुई पिटाई
आ गई याद मुझे मेरी ताई
बिना उस्तरे करे हजामत
कैसा है यह नाई
मेरी ऐसी हुई.....
हड्डी सारी चटक रही है
टीस रहा है गाल
दर्द की लहरें वही से उठे
जहा भी रख दु हाथ
कोमल काया दनलपिलोसि
धुन कर करी चटाई
कि मेरी ऐसी हुई पिटाई
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दांव खेल, पासे पलट गये- वेदप्रकाश कांबोज
दांव खेल, पासे पलट गये- वेदप्रकाश कांबोज
जासूसी उपन्यास,
समीक्षा- संदीप जुयाल, दिल्ली
सबसे पहले तो वेद प्रकाश कंबोज सर को मेरा प्रणाम🙏
मेरे द्वारा पढ़ा गया "दाँव खेल पासे पलट गए" सर का यह पहला उपन्यास है जिसे मै अभी तक दो बार पढ़ चुका हूं और सच कहु तो इस उपन्यास को दुबारा पढ़ के पहली बार से भी ज्यादा मजा आया।
भारत द्वारा अंतरिक्ष मे छोड़ा गया सबसे पहला उपग्रह जिसका नाम था "आर्यभट" जिसे 19 अप्रैल 1975 को लांच किया गया और इस उपग्रह को लांच कर के भारत अंतरिक्ष युग मे दाखिल हुआ और जिस तरीके से सर ने इस बारे मेे जानकारी दी वो काबिले तारीफ थी उस समय जिसने भी यह उपन्यास पढ़ा होगा और उसने किसी सरकारी परीक्षा मे यह प्रशन देखा होगा तो झट से इसका उत्तर दे दिया होगा इससे यह तो साबित हुआ कि इस उपन्यास को पढ़ कर पाठको का भरपूर मनोरंजन हुआ ही होगा उसके साथ उनका नॉलेज भी बढ़ा होगा और यह ही बात मुझे इस उपन्यास मे सबसे ज्यादा बढ़िया लगी की इस किताब को पढ़ के कुछ सीखने को ही मिला है।
अब उपन्यास की कहानी कुछ इस प्रकार है कि चीनियो को भनक लगती है कि भारत और रूस गुप्त रूप से आपस मे मिलकर कुछ समझौता करने जा रहे है और शायद उनकी यह योजना भी आर्यभट उपग्रह जैसी ही कोई बहुत बड़ी योजना हो और इसी बात को मालूम करने के लिए चीन अपना सबसे जांबाज, खतरनाक जासूस हुचांग को मैदान मे उतारता है ताकि इस योजना से जुड़े हुए जो भी कागजात हो वह हुचांग अपनी बुद्धि के बल पर भारत के जाने माने जासूस विजय से वह जरूरी कागजात हासिल कर सके। हुचांग और विजय की मुलाकात पहले ही ईरान की राजधानी तेहरान मे एक अजीब ढंग से हो चुकी थी और हुचांग ने विजय को इस मुलाकात के बाद एकदम बच्चा और कच्चा खिलाड़ी समझ लिया था पर विजय एक अनोखे अंदाज मे हुचांग से बोला था बेटा अफीमची विजय ने भले ही मेज के जुवे मे दांव हारा हो पर जिंदगी के जुवे मे हमेशा विजय ही रहा है, तो क्या हुचांग विजय से कागजात लेने में सफल हुआ? या इस बार विजय सच मे जिंदगी का दाव हार गया? किसने किसके लिए जाल बिछाया कौन किस के जाल मे बुरी तरह फसा यह बात तो आप इस उपन्यास को पढ़कर ही जान सकेंगे, दोनों ही बहुत बड़े महारथी है, जिंदगी का यह दांव किसने जीता यह जानने के लिए जरूर पढ़े दाव खेल पास पलट गए।
उपन्यास के दो जोकर फन्ने खाँ तातारी और कुंदन कबाड़ी जब से इन दोनों को दिखाया गया तब से इन्होंने कहानी मे मजा सा बांध दिया था इनकी बातो ने, इनकी झकझंकियो ने तो सच मे दिल छू लिया था इस उपन्यास की असली जान यह दोनों ही है और इस उपन्यास के बाद तो मै विजय का कम इनका फैन ज्यादा हो गया हु। एक जगह तो सच मे मै बुरी तरह हस हस के पागल हो गया था जब विजय का सांकेतिक भाषा मे हुचांग के लिए छोड़ा गया एक छोटा सा वाक्य था- चॉ का ट् ठा हु पल्लू गऊ। इस वाक्य को मैंने भी तोड़ने की कुछ कोशिश की थी पर सफल नही हो पाया था पर जब इसका मतलब मालूम पड़ा तो हस हस के बुरे हाल हो गए थे पर पूरे उपन्यास की कहानी समझने मे दिमाग का पुरा दही हो गया था कि आखिर चल क्या रहा है सब घूमे ही जा रहे है साथ मे मेरा दिमाग भी घुमा रहे है कर कोई कुछ कर रहा नही है आखिर यह सब क्या हो रहा है पर जब कहानी अपने अंत तक पहुची तो दिमाग को एक ऐसा झटका लगा कि 2 मिनट के लिए तो समझ ही नही सका कि क्या ऐसा भी कभी होता है और तब सिंघम फ़िल्म का एक डायलॉग याद आया यह तो चीटिंग है, मुझे हँसी भी आई पर कुछ भी कहो अंत बहुत ही शानदार था पूरा मजा आया इस उपन्यास को पढ़ कर मेरे पूरे 140 रुपये वसूल हुए है।
पर उपन्यास के अंत मे एक छोटी सी कमी भी रही और वो कमी यह रही की मुझे सिर्फ एक बात नही समझ आई थी जो कि 211 पेज नम्बर पर है पर यह कोई ज्यादा बड़ी कमी नही थी पर मै थोड़ा अनोखा किस्म का इंसान हु कही कुछ समझ नही आता तो पूछता जरूर हु और पूछने पर मेशु सर और राममेहर सर ने खुद फ़ोन कर मुझसे इस सिलसिले मे बात की थी और मुझे बताया गया कि इस बात का भी आगे से ध्यान रखा जाएगा कि आगे से किसी को कुछ पूछने की जरूरत महसूस नही होगी।
बस आखिर मे इतना ही कहना चाहूंगा कि वेद प्रकाश कंबोज सर के उपन्यास जितना जल्दी हो सके 2,3 नोवेल्स की कहानियों को एक ही बाइंडिंग मे रीप्रिंट किया जाए अगर शुरू से शुरुआत हो जाए तो कहने ही क्या बस अब अगले उपन्यास का इंतज़ार है बाकी मिलते है अगले उपन्यास के बाद।
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उपन्यास- दांव खेल, पांसे पलट गये (द्वय उपन्यास)
लेखक- वेदप्रकाश कांबोज
प्रकाशक- गुल्लीबाबा पब्लिकेशन
समीक्षा - संदीप, दिल्ली
Monday, 28 January 2019
एक हसीन कत्ल- मोहन मौर्य
एक हसीन क़त्ल- मोहन मौर्य
समीक्षक- शोभित गुप्ता
कभी कभी आप जब कोई कहानी पढ़ रहे होते हैं तो आप यह सोचते हैं, काश यह एक कहानी ही होती पर अंदर ही अंदर आप सोच रहे होते हैं कि ऐसा क्यों बदल गया है समाज! किस दिशा में, और क्यों जा रहा है! क्या यह सब ठीक नहीं हो सकता?
कहने को तो यह नॉवल एक कहानी है पर जैसी घटनाएँ इसमें दिखायी गयी हैं वो हमारे समाज में हो रही हैं और न्यूज़ चैनल्ज़ पर दिखायी जा रही हैं. इस नॉवल ने सोचने पर मजबूर किया है.
नॉवल में कहानी है कुछ VVIPs के 16-18 वर्ष के बच्चों की, जो एक बहुत ही पॉश हाई फ़ाई स्कूल में एक साथ पढ़ते हैं. इनके बीच लव त्रिकोण है, स्पर्धा है जो कि अमूमन किशोर किशोरियों में आजकल आम बात है पर तभी एक क़त्ल हो जाता है जो कि हसीन ना होकर बहुत वीभत्स है झँझोरने वाला है. शक़ की सुई कई किरदारों पर घूमती है, क़त्ल की अलग अलग वजह, अलग अलग विवेचनाएँ हैं. पर असली क़ातिल पर ध्यान अंत में ही जाता है, कम से कम मैं तो क़ातिल का कोई हिंट पहले नहीं पकड़ पाया था.
कहानी दमदार है, थ्रिल सस्पेन्स से भरपूर है. निस्सन्देह लेखक एक उत्तम प्लॉट गड़ने में सक्षम हैं.
उपन्यास में मुझे यह बात बड़ी शिद्दत से खली कि कहानी को विस्तार नहीं दिया गया. पात्रों का चरित्र पूरी तरह उभरकर नहीं आ पाया. मुझे लगता है उपन्यास में कम से कम 50-70 पृष्ठ और जोड़े जा सकते थे, संभवतया, लेखक की सोच थी कि कहीं कहानी अनावश्यक रूप से लम्बी नीरस ना हो जाए और उसकी लय ना बिगड़ जाए. अगर ऐसा था, तो मुझे लेखक की इस सोच से पूरा इत्तफ़ाक़ है. पर अगले उपन्यास में उन्हें इस बात का ख़याल रखना चाहिए कि कहानी को पात्रों के ज़्यादा संवाद के ज़रिए आगे बड़ाया जाए, उनकी भावनाओं को बेहतर से वर्णित किया जाए.
लेखक का यह पहला ही उपन्यास है और उन्होंने यक़ीनन कहानी पर दमदार काम किया है और इस प्रकार के बोल्ड विषय को चुनकर एक अदम्य साहस दिखाया है, जिसके लिए वो बधाई के पात्र हैं. यक़ीनन एक अलग प्रकार का उपन्यास पढ़ने को मिला जो तेजरफ़्तार था, कसी हुई कहानी और बेहतर सस्पेन्स के साथ. यक़ीनन अगर वो इस तरह की नए कलेवर की कहानियाँ लाते रहेंगे तो अपना एक अलग मुक़ाम बनाएँगे।
उपन्यास- एक हसीन कत्ल
लेखक- मोहन मौर्य
प्रकाशक- सूरज पॉकेट बुक्स
समीक्षा- शोभित गुप्ता
Sunday, 30 December 2018
रावायण- सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर', मनीष खण्डेलवाल
रावायण- सिद्धार्थ अरोड़ा 'सहर', मनीष खण्डेलवाल
समीक्षा- दीपाली कृष्णा
हम कोई बहुत बड़े समीक्षक नहीं है फिर भी जो महसूस किया वो लिख रहे हैं, उम्मीद है कि कुछ हद तक सही होंगे हम।
#रावायण
सिद्धार्थ सर और मनीष सर की ये किताब कहानी है,जीतू की व उसके परिवार की। जीतू, जो खानदानी ठरकी है अब खानदान भी ठरकी है तो लड़के का ऐसा होना लाज़मी है।
कहानी में पड़ोसन है, अम्मा है, बिटिया है और एक हीरो है रावण इसलिए नामकरण हुआ #रावायण।
इसमें हास्य रस भरपूर है, बीच में इश्क़,थ्रिलर,नाखून कुतरने वाली हालात ,मारधाड़, इमरान हाशमी और मर्डर भी है।
कह सकते हैं कि साउथ की, बॉलीवुड की मसाला फिल्मों को मिला कर घोटा जाए तब मिलती है रावायण।
सिद्धार्थ सर से हम पहले से वाकिफ़ है, हाँ मनीष सर से परिचय पहली दफा हुआ है, पर अब हम कह सकते हैं कि दोनों ही बेहतरीन है।
~घर में इतने मेहमान आते,मैं हमेशा सोचता हमारे घर को धर्मशाला क्यों न कहते।
मौसी व उनके बच्चे रामलीला देखने आये है,एक ही खर्चे में वो 2 रामलीला देख लेते।एक रामलीला मैदान वाली एक हमारे घर की।
सुनो तुम बहुत ऊँचे जाओगे।
मेरे लिए ऊँचे जाने का मतलब था अब मैं छत
के भी जाले साफ़ करूँगा।~
कहानी के शुरू में ही बता दिया कि घर बस नाम का घर है, बाक़ी आने वाले रिश्तेदारों ने उसको धर्मशाला समझ ही लिया है।
हाँ, इस सबसे हमको अपना गांव वाला घर याद आ गया, वहाँ भी जून में मेला लगता है और फिर घर धर्मशाला में तबदील हो जाता है, हम वही माहौल पढ़ने को मिला।
-ज्ञान
जीतू छत में बियर पी रहा होता है, बड़ा भाई अजय आता है और उसे पकड़ लेता, बियर नीचे गिर जाती(दिल दहल गया हमारा ये पढ़ कर)। घरवाले आ जाते है।
अजय : माँ देखो ये शराब पी रहा है।
जीतू के पापा : ये तो बियर है।
जैसा कि श्रीकांत सर और सिद्धार्थ कृष्ण सर बता चुके हैं बियर और शराब दो अलग अलग चीज़ें है। और बीयर वालो को शराबी कहना पाप है। इस महान तथ्य को स्पष्ठ करने के लिए लेखकों को व्यवस्था समाज की ओर से बहुत बहुत धन्यवाद
छोटी छोटी बातों में प्यार समेट लिया है इस क़िताब ने और यही पढ़ने वाले को एक अलग सी खूबसूरत दुनिया में ले जाता है, किताब में जो प्यार वाली छोटी छोटी चीज़ें लिखी गई है वो हर प्रेमी प्रेमिका ने कभी ना कभी जी होती है।
ख़ुद मे बहुत प्यार समेटी है ये कहानी।
क़िताब पढ़ कर समझ आया कि कई बार समाज अच्छे भले इंसान को बुरा बनाने में कसर न छोड़ता।
-शमशेर
हमको सबसे ज्यादा पसन्द आया शमशेर का कैरेक्टर, कमाल है वो। शमशेर कहानी का सबसे बेहतरीन और मजबूत चरित्र है।
कई बार हंसाता है तो रुला भी देता है। लोग इसे गलत मान लेते पर बन्दा दिल से हीरा है, अब लोगो का क्या है, वो तो है ही.........
जब रामलीला में काम करने वाला शमशेर उर्मी को बचाते हुए मारा जाता है, हाँ बस यही रुला देता है, जब शमशेर की लाश पड़ी है और रामलीला वाले कह रहे होते हैं कि ये रावण तो वाकई भरोसे के लायक नहीं है ,निकम्मा है लापरवाह है, जबकि उसी शमशेर ने एक अनजान के प्यार की खातिर जान दे दी। किताब में गज़ब का रोमांच और रोमांस भरा पड़ा है।
जीतू को वकील होना चाहिए, लड़के की हाज़िरजवाबी कमाल की है और पूरे परिवार की ठरक को संतुलित मात्रा में दर्शाना, अपने आप में कमाल है।
बस एक बात समझ नहीं आयी कि जीतू का सबसे छोटा भाइया बीच में कहाँ से प्रकट हो जाता है।
सिद्धार्थ सर और मनीष सर, किताबें मिलती नही है मेरे यहाँ आसानी से, इसलिये रावायण को किंडल पर लाने के लिए धन्यवाद आपका,पहली दफा मुझे किंडल पर क़िताब पढ़ कर अच्छा लगा, अब लग रहा है कि किंडल के पैसे वसूल हो गए मेरे, एक बात ये भी समझ आ गयी कि किताब में किंडल छिपा कर पढ़ते समय कितना सचेत रहना चाहिए। बाकी रावायण पढ़नी चाहिए हर किसी को।
रावायण लिखने के लिए शुक्रिया सर।
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समीक्षा- दीपाली कृष्णा
Tuesday, 27 November 2018
बानरस टाॅकिज- सत्य व्यास
बनारस टाॅकिज- सत्य व्यास
समीक्षक- बबलु जाखड़
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सत्य व्यास द्वारा लिखित *बनारस टॉकीज़* पढ़कर कुछ अजीब सा ही लगा।
बहुचर्चित होने के बावजूद ये कहा जाए तो ठीक ही होगा कि उपन्यास सामान्य सा ही था, ना कुछ स्पेशल था, ना ज्यादा सस्पेन्स, कुलमिलाकर ऐसा कथानक जिसको पढ़ा तो जा सकता है पर तारीफ के पूल नही बांधे जा सकते, बेशर्ते की उपन्यास में केवल 179 पेज ही होते।
आखिर के 13 पेज में कहानी में कुछ ट्विस्ट बनता है पर वो बनता ही है।
एक ऐसी कहानी जिसमे कोई सस्पेंस नहीं, चुहलबाज़ी भी नहीं, ना कोई हार्ट टचिंग इवेंट, बस बकैती कुछ कुछ है,
कई जगह संवाद भी खूब लंबे व वक्त खाउ ही लगे।
फिर भी ऐसा उपन्यास जिसको पढ़ा जा सकता है, पैसा वसूल हो जाये।
पर जो लोग ऐसा उपन्यास पढ़ने के तमनाई है जो कुछ विशेष हो, कुछ हटकर हो, वो यहां चाहे अपना समय खराब ना करें।
गालियों का भरपूर प्रयोग हुआ है।
फिर भी अच्छा है।
Sunday, 18 November 2018
प्रेतों का निर्माता- वेदप्रकाश कंबोज
प्रेतों का निर्माता- वेदप्रकाश कंबोज,
समीक्षा- शिखा अग्रवाल, दिल्ली।
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सबसे पहले तो यही कहना चाहूंगी कि मुझे समीक्षा लिखनी नहीं आती खासकर कम शब्दों में तो बिल्कुल नहीं, यही कारण है कि नावेल पढे 6 हफ्ते हो गए लेकिन अभी तक नहीं दी, अब प्रवीण आजाद जी के कहने पर निष्पक्ष समीक्षा लिखने की कोशिश की है।
मैंने वेदप्रकाश शर्मा जी के नावेल पढकर अपने पढने की शुरुआत की थी और यही समझती थी कि विजय विकास उनके मौलिक पात्र है, ये तो यही आकर पता लगा कि विजय,अलफंसे काम्बोज जी का पात्र है
सबसे पहले बात लेखकीय कि तो उसे पड़कर आंखे नम हो गयी, पैसे वही वसूल हो गए, उसमे सर ने ओमप्रकाश शर्मा जी, जवाहर चौधरी जी जैसी हस्तियों के बारे में अपने विचार भी बताए है, उसपे पुराना कवर पेज तो सोने पे सुहागा ही था, ये नावेल 1974 में आया था इसलिए विश्वास करना ही मुश्किल लगा कि उस समय सर मेडिकल साइंस का ऐसा विवरण कैसे कर सके, उस समय इंटरनेट जैसी चीजों का कोई वजूद भी नही था तब माइड चेंजिंग का बिल्कुल नया कांसेप्ट इस नावेल में पड़ने को मिला जो सर की अभूतपूर्व कल्पनाशीलता तो दर्शाता है, विजय, अल्फांसो, गिल्बर्ट, चीनीचोर, तातारी, कबाड़ी, बन्दर(धनुषटन्कार)और सिंगही जैसे बहुत किरदार पढने को मिले, विजय, कबाड़ी, तातारी की झकझ भी कमाल की है जिन्हें पढकर बरबस ही हँसी आ जाती है, मेरे जैसे नए पाठक को भी जिन्होंने पहले इनका कोई भी नावेल नहीं पढा, नावेल पड़कर पात्रों को समझने में कोई परेशानी नहीं होती, निसन्देह ये नावेल अपने समय का एक मास्टरपीस रहा होगा इसमे कोई दो राय नहीं है।
रही बात कुछ कमियों की तो मुझे नावेल का साइज कुछ बड़ा लगा, हमें नावेल एक स्टैण्डर्ड साइज में पढने की आदत हो गयी है, इसलिए ये नावेल हाथ मे लेकर कुछ अलग लगा, दूसरी और सबसे बड़ी बात प्रूफ रीडिंग बिल्कुल बेकार थी, बहुत बार ऐसा हुआ कि एक दो शब्द नहीं बल्कि पूरी की पूरी लाइन ही गायब हो गयी, लेकिन शुक्र था कि पढने पे समझ आ रहा था कि दूसरे ने क्या कहा होगा और उसका कहानी पे कोई फर्क नही पड़ रहा था।
सर को ऐसी रचना देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया और यही उम्मीद है कि आगे भी और जल्द ही हमे ऐसी ही दुर्लभ रचनाये पढने को मिलेंगी।
भूल चूक की माफी के साथ।
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उपन्यास- प्रेतों का निर्माता ।
लेखक- वेदप्रकाश कंबोज
प्रकाशक- सूरज पॉकेट बुक्स- मुंबई
समीक्षक- शिखा अग्रवाल, शाहदरा, दिल्ली
ध्यान दें- इस उपन्यास के सूरज पॉकेट बुक्स के प्रथम संस्करण में ही शाब्दिक अशुद्धियाँ हैं, अन्य में नहीं ।
Friday, 9 November 2018
डार्क नाइट- संदीप नाय्यर
डार्क नाइट- संदीप नाय्यर
समीक्षा- दिलीप कुमार
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डार्क नाईट पढ़ ली, कल देर रात पढ़ी, कबीर, काम,माया, प्रिया, नेहा और मीरा की कहानी ,सबसे पहले भाषा पर आते हैं ,लेखक ने जिस वर्ग को टारगेट करके कहानी लिखी थी उसे रोमन से कोई परहेज़ नहीं है लेकिन फिर भी यदि लेखक ने देवनागरी को चुना है तो ज़ाहिर है उन्हें अपनी मिट्टी और लोगों से लगाव होगा, तो भाषा के मोर्चे पर या तो अल्ट्रा मॉडर्न भाषा है या जयशंकर प्रसाद के जमाने की भाषा जैसे स्थूल, अमूर्त जैसे दुरूह शब्दो का बहुतायत प्रयोग,हिंदुस्तानी जुबान जो कि बहुतायत उर्दू शब्दों से भरी हो उसमें एक मुस्लिम युवक का इस भाषा मे कुछ ना बोलना काफी खटकता है। लेखक जिस भाषा में संवाद करते हैं वही लिख देते तो बेहतर होता जैसे धनिया की पत्ती सब्ज़ी में सुगंध भरती है वैसे ही भाषा की सुगंध नदारद है। शब्दों की सब्ज़ी तो बनी अच्छी मगर सुगंध नदारद। अब मेरी समझ से ये परे है कि लंदन का बैकग्राउंड लेखक ने क्यों रखा जब कहानी से अंग्रेज़ ही गायब हैं पब, बार, तो अब हर शहर में है। अब कबीर ये नायक है वो ना तो मजबूत है ना कमजोर,उसकी पिलपिलाये व्यक्तिव का कोई जस्टिफिकेशन नहीं है कि क्या बचपन की कोई घटना, माता पिता का अलगाव या विभिन्न मजहब से होना कोई मुद्दा तो नहीं है वो वजह नदारद है ।माँ -बाप का विभिन्न मजहब का होना क्या कोई मुद्दा नहीं है और इस मजहबी जहराब जूझ रहे लंदन में हिकमा, नेहा, प्रिया, माया का किसी का कबीर का मज़हब ना पूछना हैरान करता है ,लेखक इस मुद्दे से जूझने से बचता रहा।इस मुद्दे को लंदन में भी नजरअंदाज करना नामुमकिन है। नेहा की खुदकुशी अविश्वसनीय है जिस लड़के से उसके कई बार जिस्मानी संबंध रहे हों उसका सिर्फ एक बार और जिस्मानी संबंध पर खुदकुशी क्यों, पवित्रता, कौमार्यता की दुहाई तो थी नहीं फिर कबीर का प्रेम उसके जीवन में दस्तक दे रहा था, फ़िर इतनी पढ़ी लिखी और शराब और संसर्ग प्रिय लड़की की खुदकुशी थोड़ा कचोटती है।
कबीर की अपनी कोई बुद्धि नहीं, ईगो नहीं, स्टैंड नहीं उसके जीवन की लड़कियां फुटबॉल की तरह उससे खेलती हैं कभी वो किसी के आगोश में है तो कभी किसी के और वो वूमेनाइजर भी नही है ये बात समझ में नहीं आती।नेपथ्य में एक भारतीय मां है जो अपने लड़के का हाल खबर कभी नहीं लेती और ना कभी लड़का ही मां की सुधि लेता है । डार्क नाईट इस बीमारी का दुख ही नहीं मनाया लेखक ने,भारतीय साहित्य का प्राण तत्व विरह है, कैसा प्रेम जब नेहा के दुख में कबीर की आंखे नहीं रोई,उस अपराध बोध में उसने जीने की इच्छा को समाप्त नहीं किया और खुद को सजा ना दी तो कैसा इश्क़ साहेब।इश्क़ की इंतेहा तब होती जब वो नेहा के गम के सबब हर लड़की को ठुकराता मगर कबीर साहब का गम बियर के झाग जैसा निकला, दूसरी बात महबूब का जिनां करने वाले शख्स को कबीर द्वारा सजा ना देने का प्रयास और कुछ भी ना करना थोड़ा खटकता है ,पुरूषार्थ नाम की भी एक चीज होती है जो सिर्फ टेस्टोस्टेरोन तक महदूद नहीं रहती। निश्छल प्रेम नाम जैसा तो कुछ दिखा ही नहीं, पोर्न का विकल्प होता है साहित्य, प्रेम के डिटेल वर्णन में कहीं नहीं आंसू भी छलके,ना कोई जार जार रोया ना कोई मिलकर बाग बाग हो गया, पाठक दैहिक वर्णन से उत्तेजित तो हो सकता है आनंदित नहीं।
लेखक महोदय पढ़कर आनंद के अतिरेक आंखे यदि गीली ना हो जाएं तो उस कहानी से पाठक कैसे कनेक्ट हो सकता है, मैं कबीर के अनिर्णय से खीझता हूँ, नेहा की मौत पर नहीं रोता, एक बात और विवाह से पूर्व लिव इन में रहने वाली आर्थिक रुप से आत्मनिर्भर माया और प्रिया से कबीर एक साथ क्यों नहीं निभा सकता था ,विवाह जैसी कोई बात नहीं थी कबीर कमाता भी था फिर दो गर्लफ्रैंडस क्यों नहीं रख सकता जब इतनी ओपन सोसाइटी थी।क्लाइमेक्स पर बात करते हैं मंदी इस तरह अचानक नहीं आती जितनी मेरी दुनिया भर के वित्तीय बाजारों की समझ है उसमें फाइनेंसियल मार्किट में काम करने वाले लोग पहले ही समझ जाते हैं और अपना पैसा निकाल लेते हैं ,माना प्रिया चोटिल थी मगर फ्लैट पर मोबाइल से दीन दुनिया की खबर मिलती रहती। प्रिया की फर्म डूब गई, मंदी आ गई तो भी फाइनेंस में ह्यूमन माइंड ही असेट होता है, रोजी रोटी कमायी जा सकती थी अनाथ रही थी रईसजादी नहीं कहीं भी जी खा सकती थी। मंदी में महबूब नहीं बेचे जाते लेखक साहब ।साहित्य हो,लुग्दी साहित्य हो या नई वाली हिंदी उसकी पहली शर्त पठनीयता है जो कि इस पुस्तक में आधे हिस्से के बाद आती है, समरसिद्धा जैसी कृति के लेखक की रचना पर
जारे जागे सुभाउ हमारा
अनभल देखि ना जाइ तुहारा।
संदीप नय्यर साहब को इस सर्जना हेतु बधाई और साधुवाद,,पुस्तक की सफलता हेतु शुभकामनाएं,,कहा,सुना माफ संदीप साहब,,,इति शुभम भवति.
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पुस्तक- डार्क नाइट
लेखक- संदीप नाय्यर
समीक्षक- दिलीप कुमार